Why do farmers suffer for others for their own benefit?

Editorial:किसान अपने हित के लिए दूसरों की मुसीबत क्यों बन रहे

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Why do farmers suffer for others for their own benefit?

आखिरकार वही चार साल पहले वाले हालात किसानों की वजह से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और देश की राजधानी नई दिल्ली में बन गए हैं। सडक़ों पर खतरनाक बैरिकेड हैं, भारी पुलिस बल तैनात है, किसानों का जमावड़ा है और जनता परेशान है। हाईवेज पर वाहनों का लंबा जाम है, कोई कहीं भी जाने को स्वतंत्र नहीं है। धारा 144 लागू है और जनसामान्य का जीवन फिर बाधित हो चुका है। किसानों ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को डेढ़ साल के करीब चलाया, इस दौरान दिल्ली की सीमाएं बाधित रही और हरियाणा में सोनीपत, बहादुरगढ़ की सीमाओं से यातायात न होने की वजह से हजारों करोड़ रुपये का नुकसान अर्थव्यवस्था को हुआ। उन कानूनों को केंद्र सरकार ने वापस ले लिया, इसे किसानों ने अपनी जीत माना और अब फिर एमएसपी की गारंटी एवं अन्य मांगों को लेकर किसान संगठन अपने झंडे लेकर दिल्ली रवाना होना चाहते हैं। क्या देश के लोग इस बात को समझेंगे कि इन मांगों को पूरा करवाने के लिए किसानों की इस जिद का समर्थन किया जा सकता है? यह तब है, जब आंदोलन से किसी ने नहीं रोका है, लेकिन आंदोलन का जो तरीका अपनाया जाता है, वह किसी को भी स्वीकार नहीं हो सकता। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से इस संबंध में पहले ही कहा जा चुका है कि रास्ता रोकने का हक किसी को नहीं है। लेकिन किसान संगठन अपनी मांगों को लेकर जिस प्रकार से हालात को बिगाड़ रहे हैं, वह चिंता की बात है।

यह पहले से तय था कि केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों और किसान संगठनों के बीच बैठक विफल ही रहेगी। तीनों मंत्रियों की ओर से किसानों की अनेक मांगों पर सहमति जताई गई लेकिन एमएसपी जैसी मांग पर कमेटी बनाने की बात कही गई और किसान संगठनों ने उसी बैठक में अंतिम निर्णय की मांग की। आखिर व्यवस्थागत फैसले तीन मंत्री एक बैठक में कैसे ले सकते हैं। क्या किसान संगठनों को बातचीत की गुंजाइश नहीं निकाल कर रखनी चाहिए थी, जिस लक्ष्य से वे दिल्ली की सीमाओं को घेर कर बैठना चाहते हैं, वही चीज अगर चंडीगढ़ में सौहार्दपूर्ण माहौल में निपटाई जा सकती थी तो उसके लिए इतना बवंडर कायम करने की क्या जरूरत है। क्या यह नहीं कहा जा सकता कि किसान संगठन राजनीति से ही प्रेरित हैं और अपनी मांगों के एजेंडे को अनावश्यक तरीके से पूरा कराना चाहते हैं।

तीन कृषि कानूनों की स्वीकार्यता अपनी जगह कायम है, बेशक उन्हें वापस ले लिया गया। उस समय बड़ा किसान वर्ग इन कानूनों को सही मान रहा था, लेकिन राजनीतिक निहितार्थ से केंद्र सरकार ने इन्हें वापस ले लिया। क्या इसे आंदोलन की स्वाभाविक जीत करार दिया जाएगा। देश में इस समय पूर्व की सरकारों की तुलना में किसानों के लिए सर्वाधिक योजनाएं और लाभ प्रदान किए जा रहे हैं, बावजूद इसके किसान संगठन ज्यादा से ज्यादा की मांग पर अडक़र जन सामान्य के जीवन को बाधित कर रहे हैं। वास्तव में आम जनता को यह समझना चाहिए कि कृषि भी एक व्यवसाय है और इसे करके कोई व्यक्ति देश पर उपकार नहीं कर रहा। खेती तो वह व्यवसाय है, जिसकी आय शत प्रतिशत टैक्स मुक्त है। इसे करने के लिए तमाम सब्सिडी मिलती है और सरकार बहुत सी फसलों को एमएसपी पर ही खरीदती है। जरूरत खेती के संवर्धन की है और इसकी दुश्वारियों को खत्म करने की है।

पंजाब और हरियाणा के बॉर्डर पर आजकल हालात बेहद गंभीर हैं। यह कितना विचित्र है कि एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवेश से रोकने के लिए इतनी किलेबंदी की गई है। ऐसे हालात तो युद्ध के समय एक देश के बॉर्डर पर देखने को मिल सकते हैं, लेकिन यहां अपने ही देश में उपद्रवियों को रोकने के लिए करने पड़ रहे हैं। आखिर हरियाणा सरकार का यह तर्क क्यों नहीं जायज माना जाना चाहिए कि प्रदेश में कानून और व्यवस्था कायम करना उसका काम है, तब वह संभावित उपद्रव को रोकने के लिए अगर सख्त कदम उठा रही है तो इसे अनुचित कैसे कहा जा सकता है। वहीं पंजाब की तरफ से लगता है किसानों को रोका ही नहीं गया है, जबकि यह व्यवस्था का प्रश्न वहां भी है। वास्तव में किसानों की मांगों पर विचार होना चाहिए लेकिन इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। जबरदस्ती मांगों को मनवाने की कोशिश सही नहीं कही जाएगी। वहीं किसान संगठनों को जनसामान्य को हो रही दुश्वारियों को भी समझना होगा, आखिर वे अपने हित के लिए दूसरों की मुसीबत क्यों बन रहे हैं। 

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