एक साल तक सोना न खरीदने की अपील क्यों कर रही है सरकार? जानिए भारत के आर्थिक संकट और गोल्ड का पुराना रिश्ता

एक साल तक सोना न खरीदने की अपील क्यों कर रही है सरकार? जानिए भारत के आर्थिक संकट और गोल्ड का पुराना रिश्ता

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Why is the government urging people to refrain from buying

नई दिल्ली। Why is the government urging people to refrain from buying, एक साल तक सोना न खरीदें', प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस अपील ने देश में सोने को लेकर कई तरह की चर्चा शुरू कर दी हैं। मिडिल ईस्ट में चल रहे संकट का असर भारत पर न पड़े, इसके लिए सोना खरीदने के लिए पीएम मोदी ने मना किया है।

दुनिया में सोने (Gold) के सबसे बड़े आयातकों में भारत का नाम शामिल है। लेकिन देश को अभी इस समय सोना खरीदने से ज्यादा क्रूड ऑयल खरीदने की जरूरत है। ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, ऐसे में देश के पास अतिरिक्त धन की जरूरत है, इसलिए सरकार गोल्ड में निवेश कम करना चाहती है।

देश पर संकट के सामने आया Gold

प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश से अपील की है कि अगले एक साल तक सोना न खरीदें। ऐसा पहली बार नहीं है जब देश पर आर्थिक संकट आया है, लेकिन फिर एक बार देश को इस संकट से उबारने के लिए सरकार गोल्ड पर दांव खेल रही है।

अगर बीते समय की तस्वीर को देखें तो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार से लेकर अब के समय में पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार तक सोने ने देश को परेशानी से उबारा है।

आजादी से लेकर अब तक सरकारों के सामने ऐसी परिस्थिति खड़ी हुई है कि केंद्र सरकार को कठोर फैसले लेने पड़े हैं। आइए जानते हैं कि देश के सामने कब-कब गोल्ड ने संकट से पार पहुंचाया है।

Gold Crisis (2)

भारत-चीन युद्ध पर भी सोने पर फैसला

आजादी के बाद पहली बार गोल्ड संकट 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के दौरान आया। युद्ध के चलते देश में विदेशी मुद्रा के भंडार पर असर पड़ा था। उस समय के वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने 'गोल्ड कंट्रोल एक्ट' लागू किया, जिससे 14 कैरेट से अधिक शुद्धता वाले सोने के गहने बनाने पर रोक लग गई।

सरकार को लगा था कि इस कदम से सोने की कालाबाजारी रुक जाएगी, लेकिन ये फैसला उल्टा पड़ गया और भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचा।

सोना गिरवी रखकर देश को बचाया

आम आदमी को जब भी पैसों की जरूरत पड़ती है, तब उसके पास पैसों के इंतजाम के लिए केवल एक ही रास्ता बचता है कि वो सोने को गिरवी रखकर पैसों का इंतजाम करे।

किसी भी आम आदमी के जीवन में सोना गिरवी रखने का फैसला काफी कठिन और अंतिम फैसला होता है, क्योंकि सभी उपाय तलाशने के बाद ही व्यक्ति सोना गिरवी रखने का फैसला ले पाता है।

ऐसा की कुछ 1991 में भारत सरकार के साथ हुआ। उस समय देश के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के समय में देश के सामने ऐसी स्थिति आ गई कि विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह खाली हो गया। देश के पास केवल दो हफ्ते के आयात के लिए पैसे बचे।

ऐसे में आम आदमी की तरह ही सरकार के पास भी केवल एक रास्ता बचा। सरकार ने बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड में 47 टन सोना गिरवी रखवा दिया।

सरकार के इस फैसले की वजह से तमाम नेताओं को खूब ताने सहने पड़े, लेकिन 1991 में लिए गए इसी फैसले ने आर्थिक उदारीकरण को जन्म दिया।

Gold Crisis (1)

तेजी से गिरा रुपया

2013 में एक बार फिर देश के आगे ऐसे ही समस्या आई, तब भी सोने को लेकर मनमोहन सिंह की सरकार को बड़ा फैसला लेना पड़ा। 2013 में डॉलर के मुकाबले रुपया तेजी से गिर रहा था। इसका बड़ा कारण ये था कि देश में सोने का आयात अंधाधुंध तरीके से किया जा रहा था। इसके लिए सरकार ने आयात शुल्क को बढ़ाकर 10% कर दिया।

भारतीय रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और उस समय की मनमोहन सिंह की सरकार ने गोल्ड इंपोर्ट को नियंत्रित करने के लिए 80:20 स्कीम लागू की। इसका मतलब था कि अगर 100 किलो सोना इंपोर्ट किया जाता है तो इसमें से केवल 80 किलो सोने को ही देश में बेचने की अनुमति थी जबकि 20 किलो सोने को एक्सपोर्ट करना जरूरी था।

कांग्रेस समर्थित यूपीए सरकार के इस फैसले से करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को कम करने में मदद मिली। लेकिन जैसे ही देश में सरकार बदली और पीएम मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी समर्थित एनडीए की सरकार बनी, सरकार ने इस स्कीम को खत्म कर दिया। सरकार ने दावा किया कि इस स्कीम से सोने की तस्करी बढ़ने की खबरें आने लगी थीं।

'एक साल तक गोल्ड न खरीदें'

देश के आगे फिर एक बार मिडिल ईस्ट का युद्ध चुनौती बना हुआ है और भारत ने फिर एक बार इस संकट से उबरने के लिए सोने को सामने रखा है। प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से अपील करते हुए कहा, अगला एक साल तक संभव हो सके तो सोना न खरीदें।

सरकार की इस अपील से अगर लोग सोने में निवेश करना कम कर देते हैं तब देश के ऊपर सोना खरीदने का अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा और विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल विदेशों से कच्चा तेल आयात करने में किया जा सकता है।