Whirlwind again in Maharashtra politics

Editorial: महाराष्ट्र की राजनीति में फिर बवंडर, राकांपा अब किसकी ?

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Whirlwind again in Maharashtra politics

Whirlwind again in Maharashtra politics महाराष्ट्र की राजनीति में आया यह बवंडर पूरे देश को भौचक्का कर रहा है कि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एकाएक कैसे टूट गई, जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार के पद छोड़ने की कहने पर पार्टी नेता बिलख-बिलख कर उनसे इसकी गुहार लगा रहे थे कि वे उनके रहनुमा बने रहें।

हालांकि राजनीति का यही सार होता है कि यहां रिश्ते-नाते और दोस्ती कोई मतलब नहीं रखती, रखती है तो केवल सत्ता की चाह। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार अब महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बन गए हैं और दावा कर रहे हैं कि राकांपा के 40 विधायक शिंदे-फडणवीस सरकार के साथ हैं। निश्चित रूप से यह भाजपा और शिवसेना गठबंधन की सरकार को और मजबूती देगा, लेकिन इस उलटफेर ने राकांपा और उसके प्रमुख शरद पवार को जो नुकसान पहुंचाया है, उसका घाव जल्द नहीं भर पाएगा।

अजीत पवार इससे पहले भी एक बार रातों-रात भाजपा सरकार का हिस्सा बनने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन तब उनका यह प्रयास विफल हो गया था और वे वापस लौट आए थे। संभव है, इस बार वे वापस नहीं लौटेंगे, क्योंकि इस बार वे पार्टी के शीर्ष नेताओं में शुमार प्रफुल पटेल, छगन भुजबल को भी साथ ले गए हैं। भुजबल तो सरकार में मंत्री बन चुके हैं। प्रफुल पटेल को हाल ही में राकांपा का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन यह पद उन्हें पार्टी में रोक कर नहीं रख सका, क्यों?

यह पूरा घटनाक्रम तब सामने आ रहा है, जब देश में आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं, विपक्ष के राजनीतिक दल भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। वहीं देश में समान नागरिक संहिता को लेकर भी बहस का दौर जारी है। महाराष्ट्र में हाल ही में मुस्लिम शासक औरंगजेब को लेकर विवाद खड़ा हुआ था, इसके बाद राकांपा और शिवसेना उद्धव ठाकरे ने उलटे उपद्रवियों का समर्थन करते हुए सरकार पर आरोप लगाए थे। निश्चित रूप से महाराष्ट्र की जनता ऐसी बातों को स्वीकार नहीं करती, जिनमें हिंदु राष्ट्रवादियों और स्वतंत्रता सेनानियों पर आघात किया जाए।

राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय दलों की एकजुटता का आह्वान किया था, पटना में विपक्षी दलों की बैठक में शरद पवार की बेटी एवं सांसद सुप्रिया सुले ने हिस्सा लिया था। क्या यह माना जाए कि इन सभी घटनाओं ने राकांपा की टूट का आधार तैयार किया है। सबसे बढक़र यह कि वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुन: इस पद पर आसीन होने का दावा किया है। यानी विपक्ष की एकजुटता में भाजपा ने सेंधमारी कर दी।

यह अपने आप में अप्रत्याशित है कि जो विपक्ष खुद को एकजुट नहीं कर पा रहा है, वह भाजपा के खिलाफ क्या लड़ेगा। अब इन सवालों का जवाब कौन देगा कि भाजपा के साथ आए ज्यादातर नेताओं पर सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय की जांच चल रही है, खुद छगन भुजबल तो दो साल कैद की सजा भी काट आए हैं। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी यही आरोप लगाते हैं कि भाजपा के पास आकर आरोपी नेता भी दूध के धुले हो जाते हैं, हालांकि दूसरे दलों में वे आरोपी ही रहते हैं।

एक जमाने में कांग्रेस से अलग हुए राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार ने भी उस समय इसी तरीके से अपना अलग वजूद कायम किया था। वे मौजूदा राष्ट्रीय राजनीति के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। मौजूदा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के चुनाव से पहले ऐसी चर्चा थी कि शरद पवार अगले राष्ट्रपति बन सकते हैं, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की थी, जिसके बाद इन चर्चाओं को और बल मिला था, हालांकि बाद में उन्होंने इससे इनकार कर दिया। वे कांग्रेस, शिवसेना उद्धव ठाकरे के साथ महाविकास अघाड़ी बनाकर चलते रहे। लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा पार्टी को बनाए रखने की थी लेकिन उनके भतीजे अजीत पवार और अन्य वरिष्ठ नेताओं को अपने राजनीतिक भविष्य को देखना था। शरद पवार ने अपनी बेटी सुप्रिया सूले को आगे बढ़ाने के लिए अध्यक्ष पद से इस्तीफे का प्रहसन रचा, लेकिन फिर उस पर खुद ही पर्दा डाल दिया।

जाहिर है, उसी समय पार्टी के नेताओं को इसकी भनक मिल चुकी थी कि अब पार्टी का भविष्य खतरे में है और अब जब अजीत पवार शिंदे-फडणवीस सरकार का हिस्सा बन चुके हैं तो वे राकांपा के चुनाव निशान और प्रॉपर्टी पर भी दावा जताने लगे हैं, यानी वे कह रहे हैं कि पार्टी को अब वे अपने तरीके से चलाएंगे। यह निश्चित रूप से शरद पवार के राजनीतिक दौर का समापन है, हालांकि यह जरूरी था कि वे समय रहते पार्टी के नेतृत्व को बदलते और दूसरे नेताओं को मौका देते। राकांपा भी एक परिवारवादी पार्टी है, तो क्या यह समझा जाए कि देश की सभी परिवारवादी पार्टियों का यही हश्र होने जा रहा है। यह निश्चित रूप से एक सबक है। 

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