भारत में महिला कर्जदारों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि, 76 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा लोन पोर्टफोलियो
Financial Inclusion 2025
नई दिल्ली: Financial Inclusion 2025: भारत की आर्थिक प्रगति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को रेखांकित करते हुए नीति आयोग ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल 'सिस्टम क्रेडिट' (कुल बैंकिंग ऋण) में महिला कर्जदारों की हिस्सेदारी अब 26% तक पहुंच गई है. वित्तीय वर्ष 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं का कुल क्रेडिट पोर्टफोलियो अब ₹76 लाख करोड़ का हो गया है.
आठ वर्षों में 4.8 गुना की भारी बढ़ोतरी
'विमेन एंटरप्रेन्योरशिप प्लेटफॉर्म' (WEP) के तहत ट्रांसयूनियन सिबिल और माइक्रोसेव कंसल्टिंग (MSC) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2017 में महिलाओं का कुल ऋण पोर्टफोलियो केवल ₹16 लाख करोड़ था. पिछले आठ वर्षों में इसमें 4.8 गुना की शानदार वृद्धि देखी गई है. यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय महिलाएं अब केवल बुनियादी वित्तीय समावेशन (बैंक खाता खोलने) तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सक्रिय रूप से कर्ज लेकर निवेश और व्यापार कर रही हैं.
व्यापारिक ऋण में जबरदस्त उछाल
रिपोर्ट की सबसे बड़ी विशेषता महिलाओं द्वारा लिए जाने वाले बिजनेस लोन में आई तेजी है. 2022 से 2025 के बीच, महिला उद्यमियों को दिए जाने वाले कमर्शियल क्रेडिट में 31% की वार्षिक वृद्धि (CAGR) दर्ज की गई. इसकी तुलना में, कुल कमर्शियल क्रेडिट की वृद्धि दर केवल 17% रही. यह स्पष्ट करता है कि महिलाएं अब नए स्टार्टअप और छोटे उद्योगों (MSME) की स्थापना के लिए ऋण लेने में पुरुषों से कहीं आगे निकल रही हैं.
डिजिटल इंडिया और बदली हुई सोच
नीति आयोग की सीईओ निधि छिब्बर ने इस उपलब्धि पर कहा कि डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और औपचारिक ऋण प्रणालियों के मिलन ने महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बदल दिया है. अब महिलाएं केवल व्यक्तिगत जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि खुदरा और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ऋण ले रही हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में लगभग 16 करोड़ महिलाएं क्रेडिट-एक्टिव (सक्रिय कर्जदार) हैं. हालांकि, भारत में अभी भी लगभग 45 करोड़ ऐसी महिलाएं हैं जो ऋण लेने के लिए पात्र हैं लेकिन बैंकिंग सिस्टम से पूरी तरह नहीं जुड़ी हैं. यह बैंकिंग क्षेत्र के लिए विकास का एक बहुत बड़ा अवसर है.
इसके अलावा, सूक्ष्म वित्त क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया है. लगभग 19% महिलाएं अब छोटे समूहों के बजाय व्यक्तिगत व्यावसायिक ऋण की ओर बढ़ चुकी हैं. यह बदलाव भारतीय महिलाओं की बढ़ती वित्तीय क्षमता और अर्थव्यवस्था में उनके गहरे एकीकरण का प्रतीक है.