पिहोवा का धर्मराज मंदिर: त्रेतायुग से जुड़ी आस्था और पिंडदान की अनूठी परंपरा
- By Gaurav --
- Saturday, 25 Jul, 2026
Pehowa's Dharmraj Temple Reflects
पिहोवा 25 जुलाई।धार्मिक नगरी पिहोवा ।जिसका संबंध त्रेता युग से मृत्यु के देवता यमराज धर्मराज से भी रहा है। पिहोवा जिसका प्राचीन नाम पृथुदक है। भगवान विष्णु के नवम अंश महाराज पृथु ने इस पवित्र नगरी पर आकर अपने पितरों को उदक अर्थात जल दिया था तथा अपने पितरों की अक्षय मोक्ष की कामना की थी। महाराज पृथु के उदक जल देने पर इसका नाम पृथुदक पड़ा। इसी भूमि पर ब्रह्मा जी ने वेदों की रचना की तथा सृष्टि की रचना के लिए वर्ण व्यवस्था की। प्रारंभ से ही यह क्षेत्र ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा। यहीं पर मृत्यु के देवता सूर्य पुत्र यमराज धर्मराज का मंदिर है । इतिहास कार विनोद पंचोली ने बताया कि इस मंदिर का वर्णन जहां वेदों में है ।वही भागवत में भी इस मंदिर का वर्णन है। मुगलों के शासनकाल में इस क्षेत्र में भारी लूटपाट हुई। तथा मंदिर गिरा दिए।इससे पहले मुस्लिम लुटेरे मोहम्मद गजनवी व अहमद शाह अब्दाली ने सैकड़ो मंदिरों को गिराया तथा भयंकर लूटपाट की। इस क्षेत्र से सभी सूर्य मंदिर नष्ट कर दिए।इतना ही नहीं एक बार इस तीर्थ पिहोवा में पिंडदान कर्मकांड के कार्य पर भी प्रतिबंध लगा दिया । टैक्स भी लगाया।सन 1883 में दोबारा पिंडदान शुरू हुआ। परंतु मराठा सरदार सदा शिव राव भाऊ जीने इस धार्मिक स्थल की रक्षा की तथा इसका पुनरुद्धार किया ।यहां की पवित्रता महानता को बहाल कराया। जानकारी देते हुए इतिहासकार विनोद पचौली ने बताया की वर्तमान में इस मंदिर को लगभग 100 वर्ष पहले बनाया गया था हालांकि मूर्ति जो यमराज की है वह तीसरी व चौथी शताब्दी की है। सन्यासी दश नाम जूना अखाड़ा के साधु संतों ने यहां पर लगभग 100 वर्ष पूर्व शिव मंदिर और साधुओं का अखाड़ा मंदिर बनाया था। सूर्य पुत्र धर्मराज की मूर्ति उन्हें एक समाधि के साथ लगी हुई मिली। बाद में उन्होंने उस मूर्ति को शिव मंदिर के आगे ही लगा दिया। लगभग 20 वर्ष पूर्व अलग से धर्मराज और यमराज मंदिर का निर्माण किया गया। जिसमें इस पुरानी मूर्ति के साथ-साथ ही धर्मराज की व चित्रगुप्त की मूर्तियां भी लगाई गई ।विनोद पंचोली ने बताया कि संभवतया पिहोवा में जो त्रेतायुग से मृतक पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए गति पिंडदान कर्मकांड का कार्य किया जा रहा है। वह इस मृत्यु के देवता धर्मराज से संबंधित ही है। धर्मराज यमराज का इस पृथुदक पिहोवा तीर्थ में होना ही इस बात का प्रमाण है कि युगो युगो से यहां पर मृतक पूर्वजों के प्रति पिंडदान कर्मकांड होता रहा है ।जो आज भी जारी है।