Nuh violence should not involve politics

Editorial: नूंह हिंसा में न हो राजनीति, अपराध का सच आए सामने

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Nuh violence should not involve politics

Nuh violence should not involve politics हरियाणा के नूंह में सांप्रदायिक हिंसा की आग के आरोपियों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर जिस प्रकार की राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सबसे पहले तो यह कि यह सोचा-समझा ऐसा अपराध था, जिसने न केवल नूंह को जला दिया अपितु पूरे प्रदेश की छवि को देश व दुनिया में खराब किया। इसके आरोपी चाहे वे किसी भी संगठन, वर्ग, दल से संबंधित हैं, उनकी पहचान होना और उन पर कड़ी कार्रवाई होना आवश्यक है।

यह अपने आप में बेहद चिंताजनक है कि पुलिस ने इस मामले में कांग्रेस विधायक मामन खान को गिरफ्तार कर लिया है। मामन खान को पुलिस की ओर से जांच में शामिल होने के अनेक नोटिस दिए गए थे, लेकिन वे किसी न किसी कारण का हवाला देकर बचते रहे। अब यह अपने आप में प्रश्न है कि आखिर राजनीति कानून पर हावी क्यों हो जाती है। देश संविधान से चल रहा है और कानून सबके लिए बराबर है, तब एक विधायक यह कैसे तय कर लेते हैं कि उनके साथ राजनीति हो रही है और वे जांच में शामिल नहीं होंगे। बेशक, किसी पर लगे आरोपों की सच्चाई उस मामले की जांच और अदालत के निर्णय से सामने आती है। तब इस मामले में भी पुलिस की जांच और अदालत पर भरोसा किया जाना चाहिए।

 इस प्रकरण में एक नाम मोनू मानेसर नामक आरोपी का भी आया है। उन पर हिंसा को भडक़ाने की वजह बनने का आरोप है। हालांकि वह अब राजस्थान पुलिस की कस्टडी में है। लेकिन मानेसर के नाम पर भी हरियाणा में राजनीति चरम पर है। एक ङ्क्षहदू संगठन ने न केवल उसका समर्थन किया है, अपितु सत्ता और बाहर बैठे राजनेताओं ने भी उसके पक्ष में आवाज बुलंद की है। हालांकि ऐसे इनपुट आए हैं कि मोनू मानेसर अपराध की दुनिया में बड़ा नाम बनना चाहता था और उसके अपराधियों से संपर्क हैं। बेशक, उसका नाम एक गौरक्षक के रूप में भी प्रचलित है, लेकिन क्या अपराध और किसी अपराधी को इस प्रकार संरक्षित किया जाना चाहिए।

यह गलत प्रचलन होगा कि किसी दूसरे राजनीतिक दल से जुड़े नेता को अपराधी ठहरा दिया जाए और किसी अन्य दल के लोगों से संपर्क रखने वाले व्यक्ति को निर्दोष करार दे दिया जाए। बेशक, अब दोनों ही पुलिस की गिरफ्त में हैं लेकिन इस मामले को राजनीतिक चश्मे से देखे जाने की बजाय पूरी तरह से एक आपराधिक घटना के रूप में देखा जाना चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आए और असल अपराधी को सजा दिलाई जा सके। बेशक, मोनू मानेसर की भूमिका नूंह हिंसा में संदिग्ध है, क्योंकि जिस प्रकार के वीडियो सामने आए थे, उसमें एक व्यक्ति अपने धर्म के लोगों से उस यात्रा में शामिल होने का आह्वान कर रहा है जोकि आस्था स्वरूप निकाली जानी है। लेकिन अगर इस आह्वान को कोई दूसरे नजरिये से देख रहा है और उससे भडक़ रहा है तो यह उन्हीं से पूछा जाना चाहिए कि आखिर किसी की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन वे कैसे कर रहे हैं।

नूंह में जुलाई के अंतिम दिनों में यह ङ्क्षहसा भडक़ी थी, जिसके बाद कई हफ्ते इलाके में अशांति बनी रही, हालांकि अब फिर से यह इलाका संवेदनशील हो गया है। नूंह में धारा 144 लागू है और इंटरनेट भी बंद कर दिया गया है। निश्चित रूप से यह सब जनता के लिए असुविधाजनक है, लेकिन अगर आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होगी और मामले की जांच नहीं होगी तो सच सामने नहीं आ पाएगा।

यह मालूम होना जरूरी है कि आखिर वह कौन है, जिसने नूंह को जलाया और फिर पूरे प्रदेश को बदनाम होने दिया। यह भी अहम सवाल है कि किसी की धार्मिक यात्रा को लेकर इस प्रकार से षड्यंत्र रचा गया। नूंह में सांप्रदायिक तनाव नई बात नहीं है, यहां आए दिन ऐसे वाकये घटते रहते हैं, जो कि लोगों के लिए परेशानी का सबब बनते हैं। हरियाणा की छवि ऐसी नहीं है कि वहां सांप्रदायिक तनाव पैदा हो, लेकिन अपराधी तत्व ऐसी फिराक में रहते हैं और उन्हें फीडबैक मिलता है विदेश में बैठे आतंकी तत्वों से। इस मामले में भी पुलिस को जांच में ऐसे इनपुट मिले हैं, जिनका वास्ता विदेश से है। तब उन सभी पक्षों की जांच आवश्यक है, जोकि इस प्रकरण के घटने की वजह बने हैं।

गौरतलब है कि इस प्रकरण में राजनीतिक दल के नेता की ओर से कहा गया कि नूंह में आपकी लड़ाई मैं लड़ूंगा। बेशक, अपनी कौम, अपने वर्ग के हितों के लिए लडऩा गलत नहीं है, लेकिन अगर किसी दूसरे वर्ग के अधिकार और उसकी स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाकर कोई ऐसा करना चाहता है तो यह गैरकानूनी ही करार दिया जाएगा। इस प्रकरण में तमाम बयान सामने आ रहे हैं, जरूरत इसकी है कि इस मामले को भडक़ने से रोका जाए और इसे दो वर्गों की लड़ाई न बनाकर केवल अपराध की नजर से देखा जाए। हरियाणा को शांति और तरक्की चाहिए, जोकि ऐसी घटनाओं से बाधित हो रही है। 

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