स्वर्ण पदक जीतने के बाद भी झाड़ू लगाने को मजबूर दिव्यांग खिलाड़ी, झारखंड की व्यवस्था पर उठे सवाल
Differently-abled Athlete Forced to Sweep Floors
रांची। Differently-abled Athlete Forced to Sweep Floors, रांची में झारखंड के खेल तंत्र की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो खिलाड़ियों के सम्मान और उनके भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े करती है। जिस खेल निदेशालय का काम खिलाड़ियों को प्रोत्साहन और सम्मान देना है, उसी परिसर में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने वाली 29 वर्षीय दिव्यांग खिलाड़ी सुनीता कुमारी पिछले 10 वर्षों से झाड़ू लगाकर अपनी जीविका चला रही है।
विडंबना यह है कि निदेशालय के अधिकांश अधिकारियों को यह तक पता नहीं कि उनके कार्यालय में सफाई का काम करने वाली महिला राष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी है।
2024 में जीता था स्वर्ण पदक
सुनीता ने वर्ष 2024 में थ्रो बॉल की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में झारखंड का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर की पैरा वॉलीबॉल प्रतियोगिता में भी स्वर्ण पदक अपने नाम किया। लेकिन, इन उपलब्धियों के बावजूद उन्हें न तो कोई विशेष सम्मान मिला और न ही खेल उपलब्धियों के अनुरूप अवसर।

बकौल सुनीता, माता-पिता के निधन के बाद से वह भाई-भाभी के साथ रहती हैं और जीवनयापन के लिए 2016 से खेल निदेशालय में सफाई का काम करती हैं। बचपन से ही खेल में दिलचस्पी में रही है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की इच्छा
आगे और खेलना है सुनीता को सुनीता ने 2024 में तमिलनाडु में टीम के साथ पारा नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप खेला था। इसके बाद 2025 में मेरठ में हुई नेशनल चैंपियनशिप में शामिल हुई। सुनीता का कहना है कि मुझे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेना है।
सुनीता वॉलीबॉल खिलाड़ी है। खेल निदेशालय में कार्यरत है। झारखंड की खेल नीति में नौकरी का प्रावधान है। पारा खिलाड़ियों के लिए सरकार नियुक्ति निकाले और सम्मान दे। -कुमार गौरव, सचिव, पारालंपिक कमेटी ऑफ झारखंड
सीधी नियुक्तियों में भी पर्याप्त अवसर नहीं
दिव्यांग खिलाड़ियों का कहना है कि राज्य में उन्हें अक्सर उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। कई बार नकद पुरस्कार के लिए आवेदन करने पर यह कहकर मना कर दिया जाता है कि उनका खेल विभाग की सूची में शामिल नहीं है।
छात्रवृत्ति योजनाओं में भी दिव्यांग खिलाड़ियों की भागीदारी बेहद सीमित है। वहीं खेल उपलब्धियों के आधार पर मिलने वाली सीधी नियुक्तियों में भी उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता।
सम्मान, छात्रवृत्ति व नौकरी से भी दूर दिव्यांग खिलाड़ी
नौकरी के अलावा प्रतिभावान खिलाड़ियों को प्रतिवर्ष स्कॉलरशिप भी दिया जाता है। झारखंड में खिलाड़ियों को प्रतिवर्ष उनकी श्रेणी के अनुसार 36 हजार और 72 हजार रुपये स्कॉलरशिप दिया जाता था। लेकिन, पिछले 10 वर्षों से खिलाड़ियों के हाथ खाली हैं।
वहीं दूसरी ओर बिहार सरकार की ओर से प्रतिवर्ष पांच, 10 और 15 लाख रुपये केवल स्कॉलरशिप प्रदान किया जाता है। इसमें भी कैटगरी के अनुसार ही स्कॉलरशिप प्रदान किया जाता है।
झारखंड में खिलाड़ियों के हाथ खाली
राष्ट्रीय स्तर पर अगर किसी खेल में कोई खिलाड़ी पदक जीतता है तो उसको पदक के अनुसार कैश अवार्ड दिया जाता है। वहीं, सम्मान के साथ खेल कोटा के तहत सीधी नियुक्ति भी होती है। लेकिन, झारखंड में राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न तो कैश अवार्ड मिलता है और न ही सीधी नियुक्ति मिलती है।
पड़ोसी राज्य बिहार में एक नियम लागू है कि मेडल लाओ और नौकरी पाओ। इसके तहत पिछले तीन से चार वर्ष में 200 से 250 खिलाड़ियों को खेल कोटा से नौकरी मिली है। वहीं, झारखंड में 25 वर्ष में केवल 40 से 42 खिलाड़ियों को सीधी नियुक्ति के माध्यम से नौकरी मिली है।