बिहार विधान परिषद चुनाव 2026: कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की बड़ी चुनौती

बिहार विधान परिषद चुनाव 2026: कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की बड़ी चुनौती

Bihar Legislative Council Elections 2026

Bihar Legislative Council Elections 2026

पटना। Bihar Legislative Council Elections 2026, बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 में कांग्रेस अपनी आखिरी राजनीतिक उम्मीद बचाने की लड़ाई लड़ रही है। पार्टी कोटे से विधान पार्षद डॉ. समीर कुमार सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, लेकिन मौजूदा विधानसभा गणित कांग्रेस के खिलाफ खड़ा दिखाई दे रहा है। संख्या बल के लिहाज से देखें तो कांग्रेस के लिए अपनी यह एकमात्र सीट बचा पाना बेहद कठिन माना जा रहा है।

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में विधान परिषद की एक सीट जीतने के लिए लगभग 25 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। मौजूदा स्थिति में एनडीए 200 से अधिक विधायकों के मजबूत समर्थन के साथ पूरी तरह निर्णायक स्थिति में है।

दूसरी तरफ महागठबंधन अंदरूनी खींचतान, घटती संख्या और आपसी अविश्वास से जूझ रहा है। कांग्रेस की स्थिति सबसे कमजोर मानी जा रही है। पार्टी के पास महज छह विधायक हैं और उनमें भी एकजुटता नजर नहीं आ रही।

महागठबंधन में तालमेल चुनौती

राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के तीन विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाकर महागठबंधन प्रत्याशी को समर्थन नहीं दिया था। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस नेतृत्व की पकड़ और संगठनात्मक ताकत दोनों पर सवाल खड़े कर दिए थे।

अब वही संकट विधान परिषद चुनाव में और बड़ा रूप लेता दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में कांग्रेस अब अपनी राजनीतिक जमीन पर नहीं, बल्कि राजद की कृपा पर खड़ी दिखाई दे रही है।

राजद के पास खुद करीब 25 विधायक हैं और वह मुश्किल से अपनी एक सीट सुरक्षित रखने की स्थिति में माना जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस को अतिरिक्त समर्थन दिलाना राजद के लिए भी आसान नहीं होगा।

महागठबंधन के भीतर सीटों के तालमेल और प्राथमिकता को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यदि राजद ने अपने हितों को प्राथमिकता दी, तो कांग्रेस की सीट सीधे एनडीए के खाते में जा सकती है।

यही कारण है कि कांग्रेस खेमे में बेचैनी बढ़ती जा रही है। उसके लिए विधान परिषद चुनाव सिर्फ सीटों का चुनाव नहीं, बिहार में वास्तविक राजनीतिक हैसियत की परीक्षा भी बन गया है।

यदि कांग्रेस यह सीट गंवाती है, तो विधान परिषद में उसकी मौजूदगी लगभग समाप्त हो जाएगी। इसका सीधा असर आगामी विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के भीतर उसकी सौदेबाजी क्षमता और राजनीतिक महत्व पर पड़ सकता है।