बिहार राजनीति में विश्वास मत और मुख्यमंत्री पद का अनोखा इतिहास

बिहार राजनीति में विश्वास मत और मुख्यमंत्री पद का अनोखा इतिहास

The unique history of the vote of confidence and the post

The unique history of the vote of confidence and the post

पटना। लंबे अरसे के बाद शुक्रवार को सम्राट चौधरी के रूप में किसी विधायक ने मुख्यमंत्री के नाते विश्वास मत का प्रस्ताव पेश किया। विधान परिषद सदस्य के नाते मुख्यमंत्री रहने का संबसे लंबा रिकार्ड भी नीतीश कुमार के नाम दर्ज है। नवंबर 2005 में वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। उस समय लोकसभा के सदस्य थे।

2006 में विधान परिषद के सदस्य बने। उसके बाद मुख्यमंत्री की 10 शपथ भी उन्होंने विधान परिषद सदस्य के रूप में ही ली। 2014 में जब नीतीश कुछ महीने के लिए मुख्यमंत्री पद से हटे थे तो उस अवधि में मुख्यमंत्री बने जीतनराम मांझी विधायक थे।

1968 में वीपी मंडल से शुरू हुआ

राज्य में विधायक के बदले विधान परिषद के सदस्य के मुख्यमंत्री बनने का सिलसिला फरवरी 1968 में वीपी मंडल से शुरू हुआ। वे उस समय मधेपुरा से सांसद थे।लेकिन, मुख्यमंत्री पद के लिए विधान परिषद के सदस्य बने।

उसके बाद कई कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री रहने के दौरान विधान परिषद के सदस्य रहे। इनमें भोला पासवान शास्त्री, चंद्रशेखर सिंह, भागवत झा आजाद और सत्येंद्र नारायण सिन्हा का नाम शामिल है। 1989 में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री बने डा. जगन्नाथ मिश्र विधायक थे।

उनके बाद 1990 में तत्कालीन जनता दल के नेता लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बने। वे उस समय सांसद थे। लालू प्रसाद का मुख्यमंत्री का पहला कार्यकाल विधान परिषद सदस्य के रूप में गुजरा। वे 1995 में विधायक बने।

उसके बाद उनके मुख्यमंत्री का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ। वैसे, लालू प्रसाद की तरह राबड़ी देवी को भी विधान परिषद और विधानसभा सदस्य के नाते मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला।