Need to understand both society and politics

समाज और राजनीति दोनों को समझने की जरूरत    

Need to understand both society and politics

Need to understand both society and politics

Need to understand both society and politics- देश में कुछ समय पहले सहिष्णुता (tolerance) को लेकर बहस शुरू हुई थी, इसमें नेता-अभिनेता, जनता सभी शामिल हो रहे थे। फिर एकाएक इस पर बहस बंद हो गई, लेकिन न कोई सहिष्णु होना सीख पाया है और न ही कोई असहिष्णुता (tolerance) छोड़ पाया है। राजनीति और समाज का आपस में नैसर्गिक संबंध हैं, समाज से ही राजनेता (Politician) सामने आते हैं और राजनेता ही सत्ता की प्राप्ति कर जनता के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम करते हैं। लेकिन यह चिंता की बात है कि आज के समय न समाज अपने सरोकार पर टिका है और न ही राजनेता समाज की बुनियाद को मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं। उन्हें बस अपना राजनीतिक स्वार्थ नजर आ रहा है, जिसे वोट में परिवर्तित करना है।

दरअसल, मामला एक नहीं है, अनेक हैं जोकि आपस में जुड़े हुए हैं। किसी एक राजनीतिक दल (Political Party) को भी दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि हवा में ऐसा जहर है जिसने प्रत्येक के बोल दूषित कर दिए हैं। सवाल यह है कि क्या देश के लिए शहादत देने वालों को मेरा या तुम्हारा की संज्ञा दी जा सकती है? देश को आजाद कराने और यहां तक पहुंचाने में किसी एक दल विशेष का योगदान नहीं रहा है अपितु पूरे देश के हर उस व्यक्ति का योगदान रहा है, जिसने आजाद (Freedom) होने की चाह अपने मन में रखी थी। हालांकि आजादी (Freedom) के बाद से कांग्रेस (Congress) इसका दावा करती आई है कि उसी की वजह से देश आजाद हुआ, लेकिन कांग्रेस के नेता यह भूल जाते हैं कि महात्मा गांधी ने कांग्रेस को एक आंदोलन की भांति चलाया था और आजादी के बाद उन्होंने इसे खत्म करने की इच्छा जताई थी। यानी जिस मिशन के लिए कांग्रेस की स्थापना हुई थी, वह पूरा हो गया था।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे (Congress National President Mallikarjun Kharge) का वह बयान आलोचना का विषय है, जिसमें उन्होंने कहा है कि देश के लिए हमारे नेताओं ने तो कुर्बानी दी हैं, लेकिन आपके घर में देश के लिए कोई कुत्ता भी मरा क्या? इस बयान को लेकर लोकसभा में हंगामा हुआ है, सत्ता पक्ष ने इसके लिए खडग़े से माफी मांगने की मांग की, लेकिन उन्होंने इससे इनकार करते हुए अपने बयान में कायम रहने की बात कही। क्या यह बयान ऐसा है, जिस पर कायम रहा जाए। यह राजनीतिक चश्मे से देखे जाने वाली बात नहीं है, एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष (National President) की शब्दावली और मन्तव्य जिम्मेदारी पूर्ण होनी ही चाहिए। उस समय यह नहीं कहा जा सकता कि फलां भी ऐसे बोलते हैं, जिसका जवाब इसी तरह से दिया जाएगा। बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस समेत दूसरे नेताओं के बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति बेहद निम्न स्तरीय होते देखे गए हैं। सत्तापक्ष की ओर से भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए जयचंद जैसे शब्द प्रयोग किए गए हैं। ऐसे बयानों से बचा जाना चाहिए। किसी राजनीतिक की आलोचना महज आलोचना होनी चाहिए न कि उसे सामाजिक, मानसिक और शारीरिक नुकसान पहुंचाने की मंशा।

इस दौरान यह पूछा जाना आवश्यक है कि देश के लिए कुर्बानी देने के लिए मरना आवश्यक है, और अगर किसी ने अपने प्राण इस फर्ज के लिए अदा कर दिए तो क्या उसका मोल देश से मांगा जाएगा? क्या उन सैनिकों के परिवारों ने कभी देश से उनकी शहादत का मोल मांगा है, जोकि सीमा पर दुश्मन की गोलियों को झेलते हुए सर्वोच्च बलिदान को प्राप्त हो गए? आखिर राजनीतिक होना इतना कीमती होना क्यों है, कि प्राण जाने पर उसे देश के लिए कुर्बानी बता दिया जाता है और सैनिक होना इतना आम क्यों है कि उसे नौकरी के लिए फर्ज अदा करना बता दिया जाता है।

गौरतलब है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Congress leader Rahul Gandhi) ने तो अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीनी सैनिकों से भारतीय सैनिकों (Indian Army) की झड़प के लिए मार खाना और पिटना शब्द इस्तेमाल किए हैं, क्या भारतीय सैनिकों के लिए जोकि सीमा पर हर समय अपनी जान हथेली पर रखकर देश की रक्षा करते हैं के लिए ऐसे शब्द प्रयोग करना उचित है। यह सैनिकों के मनोबल को तोडऩे वाले शब्द नहीं हैं क्या, जबकि यह सच है कि भारतीय सैनिकों ने डंडों से ही चीनियों को पीट-पीटकर उनकी सीमा में धकेल दिया। कांग्रेस एवं राहुल गांधी की ओर से एक भी शब्द भारतीय सैनिकों के इस साहस के लिए नहीं बोला गया है, लेकिन सत्ता में बैठे राजनीतिक नेतृत्व पर हमलावर होते हुए सेना को बीच में लाकर ऐसे वाक्यों और शब्दों का प्रयोग खूब किया गया, जोकि दुश्मन देश के दिल को ठंडक जरूर देते हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह बयान उचित है कि राजनीतिक मतभेद और आलोचनाओं में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन किसी को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपने जवानों की निंदा नहीं करनी चाहिए।

वास्तव में देश में राजनीतिक और सामाजिक सहिष्णुता को संरक्षित और बढ़ावा देने की बड़ी जरूरत है। अब ओच्छी बातें राजनीतिक ऐसे जाहिर कर  रहे हैं जैसे इनके लिए कहीं कोई शिक्षण संस्थान खुला हो। सोच में यह जहर खत्म किया जाना चाहिए, इंसानी सोच आज शर्म और लिहाज के हर पर्दे को दूर हटाती जा रही है, सामाजिक संबंधों में हत्याएं करके सैकड़ों टुकड़े कर दिए जाते हैं, उन टुकड़ों के साथ इंसानी संवेदनाओं के भी टुकड़े हो जाते हैं। ऐसे ही राजनीति में भी मर्यादाहीनता अपने चरम पर पहुंच चुकी है, यही वजह है कि जब विचार से किसी का सामना नहीं हो पाता है तो ऐसे जहरीले, अपमानजनक शब्द तलाश कर लाए जाते हैं, जिससे बोलने वाले के दिल को तसल्ली मिले और जिसके खिलाफ बोले हैं, उसका मन-मस्तिष्क छलनी हो जाए। अगर हम शहीदों की कुर्बानियों का दावा करते हैं तो हमें उनके विचारों और उनकी सोच को अपना कर उनके जैसा होने की जरूरत है। यह बात सभी राजनीतिक दलों पर लागू होनी चाहिए। समाज वही सीख रहा है, जोकि राजनीतिक उसे सीखा रहे हैं, समाज को भी सुधरना होगा और राजनीतिक को भी।    

 

यह भी पढ़ें:

यह भी पढ़ें: