Holika Dahan: अजब नजारा! होलिका दहन की आग में शख्स का प्रवेश; दहकती लपटों के बीच से चलकर निकला, शख्स पूरी तरह सुरक्षित

अजब नजारा! होलिका दहन की आग में शख्स का प्रवेश; दहकती लपटों के बीच से चलकर निकला, शख्स फिर भी पूरी तरह सुरक्षित, वीडियो

  Mathura Phalen Holika Dahan Man Enter In Fire Video News

Mathura Phalen Holika Dahan Man Enter In Fire Video News

Phalen Holika Dahan: 2 मार्च की रात देशभर में होलिका दहन का पर्व बनाया गया। इसी बीच श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा के एक गांव में होलिका दहन का अजब और अनोखा नजारा देखना को मिला। ऐसा नजारा जिसे देखकर लोगों ने दांतों तले उंगलियां दबा लीं। और अब जब आप भी देखेंगे तो आप भी हक्का-बक्का रह जाएंगे। दरअसल, कोसी कलां के पास स्थित मथुरा के फालेन गांव में बहुत पुराने समय से होलिका दहन को लेकर एक परंपरा का पालन किया जाता है। यहां नरसिंघ भगवान का मंदिर है, जिसके पुजारी को होलिका दहन की धधकती हुई आग के बीच से गुजरना होता है। ऐसा हर साल होता और पुजारी को कुछ भी नहीं होता।

इस बार भी बीती रात होलिका दहन के दौरान ऐसा ही कुछ हुआ। जिसमें पुजारी संजु पांडा ने सिर्फ एक गमछा लपेटकर होलिका दहन की आग में प्रवेश किया और आग उगलते अंगारों के बीच होलिका को सकुशल पार किया। ये हैरानी की बात है की संजु पांडा पूरी तरह से सुरक्षित हैं। उन्हें आग से कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इस बीच सैकड़ों की संख्या में लोगों की मौके पर मौजूदगी रही और उन्होंने इस पूरे नजारे को देखा। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान स्थानीय पुलिस और प्रशासन के अधिकारी भी मौजूद रहे। मौके पर मीडिया के लोग भी रहे। वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की गई।

सवा महीने की 'तपस्या' के बाद होलिका में प्रवेश

पुजारी संजू पांडा ने बताया कि भक्त 'प्रहलाद' की इसमे असीम कृपा है। इसकी तैयारी सवा महीने पहले शुरू हो जाती है. बसंत पंचमी से होलिका दहन तक घर और परिवार से मोह समाप्त कर ब्रहमचर्य का पालन किया जाता है। भोजन छोड़ दिया जाता है। सीमा से बाहर नहीं जाया जाता है। संजू पांडा ने बताया कि वह नरसिंघ भगवान और भक्त प्रह्लाद की कृपा के भरोसे अग्नि में प्रवेश करते हैं और वही उन्हें बचाते हैं। नीचे एक वीडियो आप देख सकते हैं की किस तरह फालेन गांव में परंपरा का पालन किया जाता है। नीचे वीडियो में एक शख्स को होलिका दहन की आग के बीच से आसानी से गुजरते हुए देखा जा सकता है।

वीडियो

बताया जाता है कि जब सवा महीने पहले मंदिर के पुजारी उपवास पर बैठ जाते हैं तो इस दौरान एक अखंड ज्योत जलाई जाती है। जब होलिका दहन का पर्व आता है तो मुहूर्त के हिसाब से उस ज्योत अग्नि से इजाजत ली जाती है। इजाजत लेने के लिए पुजारी जलती हुई लौ के ऊपर अपनी हथेली लगाते हैं, जब ज्योत की आग हथेली नहीं जलाती है तो यह अग्नि की अनुमति होती है। इसके बाद उसमे से आग लेकर होलिका में प्रज्वलित की जाती है। इसके बाद पुजारी केवल शरीर पर एक गमछा बांधे हुए पहले 'प्रहलाद' कुंड में डुबकी लगाते हैं और इसके बाद धधकती हुई आग की लपटों के बीच से होलिका को पार करते हैं। वह 19 कदम चलकर पार करते हैं और इस बीच उनके शरीर का एक बाल भी नहीं जलता। यह हर साल होता है।