मंडी: खलियार वार्ड में टिकट की जंग, कांग्रेस के भीतर सियासी संग्राम तेज

मंडी: खलियार वार्ड में टिकट की जंग, कांग्रेस के भीतर सियासी संग्राम तेज

Mandi: Battle for Ticket in Khaliyar Ward

Mandi: Battle for Ticket in Khaliyar Ward

मंडी। नगर निगम मंडी के वार्ड एक खलियार का चुनावी रण अब केवल सीट का संघर्ष नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर साख की लड़ाई बन गया है। इस वार्ड से टिकट के लिए मचे घमासान ने शिमला से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।

एक तरफ प्रदेश की राजनीति के दिग्गज एवं पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर का पारिवारिक रसूख दांव पर है, तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री और दिल्ली दरबार में गहरी पैठ रखने वाली तेजतर्रार नेता अलकनंदा हांडा ने मोर्चा खोल दिया है।

भतीजे के लिए कौल ने झोंकी ताकत

पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर इस बार अपने भतीजे अधिवक्ता प्रवीण ठाकुर को चुनावी मैदान में उतारने के लिए अडिग हैं। प्रवीण ठाकुर ने अधिकारिक रूप से आवेदन कर रखा है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि कौल सिंह अपने ही प्रभाव क्षेत्र में भतीजे को टिकट नहीं दिला पाते, तो यह उनके राजनीतिक वर्चस्व के लिए बड़ा झटका होगा। विरोधी खेमा इसे घर में हार के रूप में प्रचारित करने की फिराक में है। उनकी चचेरी बहन कांग्रेस पार्टी की जिला अध्यक्ष चंपा ठाकुर भी पैरवी करने में लगी है।

हांडा का चार जीत का रिकार्ड और खत्री कार्ड

दूसरी ओर पेशे से अधिवक्ता अलकनंदा हांडा की इस वार्ड पर जबरदस्त पकड़ है। वह यहां से चार बार चुनाव जीत चुकी हैं। खलियार वार्ड उनकी कर्मभूमि रहा है। उनकी सबसे बड़ी ताकत खत्री मतदाता हैं, जिनकी इस वार्ड में निर्णायक भूमिका है। भाजपा ने खत्री वर्ग की दो महिलाओं को मैदान में उतारकर पहले ही दांव खेल दिया है।

पुरानी से सरिता हांडा और पड्डल वार्ड से निर्मल वर्मा को टिकट दिया है। कांग्रेस ने अभी तक इस वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। जानकारों का मानना है कि यदि अलकनंदा का टिकट कटा, तो खत्री समुदाय एकमुश्त कांग्रेस से छिटक सकता है।

बगावत की आहट से सहमी कांग्रेस

अलकनंदा हांडा ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वह किसी भी सूरत में पीछे हटने वाली नहीं हैं। यदि पार्टी कौल सिंह के दबाव में आकर उनका पत्ता काटती है, तो वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतर सकती हैं।

खलियार वार्ड की बाजी किसके हाथ लगेगी, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इस खींचतान ने कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी को सार्वजनिक कर दिया है। अब हाईकमान को तय करना है कि वह कौल सिंह की प्रतिष्ठा बचाएगी या अलकनंदा के जनाधार पर भरोसा जताएगी। सबकी नजरें अब दिल्ली से होने वाली घोषणा पर टिकी हैं।