No need for male commission

Editorial:पुरुष आयोग की जरूरत नहीं, पर न्याय की तराजू रहे समान

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No need for male commission

No need for male commission सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पुरुष आयोग गठित करने की मांग और इस मांग को खारिज करने की कवायद पर विचार आवश्यक है। माननीय न्यायालय ने इस मांग को इस आधार पर खारिज कर दिया कि पुरुषों के लिए ऐसे किसी आयोग की जरूरत नहीं है। वहीं अदालत की ओर से याचिकाकर्ता को फटकार भी लगाई है।

निश्चित रूप से एक पुरुषवादी समाज जहां प्रत्येक निर्णय पुरुष की ओर से लिए जाते हों, वहां पर एक पुरुष आयोग की मांग करना बेमानी है। हालांकि सभी पक्षों की ओर से यह माना जाना चाहिए कि आज भारतीय समाज में घरेलू हिंसा सिर्फ महिलाओं के साथ ही नहीं घट रही है, वह पुरुषों के साथ भी घट रही है। अब यह और बात हो सकती है कि इसका प्रतिशत महिलाओं के खिलाफ ज्यादा है। भारतीय समाज में महिलाओं को सदैव अग्रणी स्वीकारा जाता रहा है, यह समाज देवताओं से पहले देवियों की आराधना करता है। महिलाओं पर अत्याचार हमेशा से नहीं होता आ रहा है।

इतिहास में ऐसी व्याख्याएं हैं कि मुगल काल से पहले मूल भारतीय समाज में महिलाएं ही परिवार की नेता होती थीं और उनकी निर्देशन में सभी निर्णय लिए जाते थे। हालांकि फिर परिस्थितियां बदलती गईं, पर्दा प्रथा भारत पर थोपी गई रवायत है, जिसे मुगलों की वजह से और उनकी मौजूदगी की वजह से लागू कराया गया। कहने का अर्थ यह है कि भारत में महिलाएं अगर प्रताडऩा का शिकार हुई हैं, हो रही हैं तो यह स्वाभाविक नहीं था। यह एक सुनियोजित साजिश के तहत हुआ है। हालांकि समय के साथ समाज और सरकारों को इस बारे में सोचते हुए कानून बनाने पड़े हैं।

सर्वोच्च न्यायालय में जो याचिका दायर की गई थी उसमें कहा गया था कि घरेलू हिंसा से परेशान पतियों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए इसे दायर किया गया है। दरअसल, घर-परिवार और नौकरी-पेशे का दबाव अकेले महिलाएं ही नहीं झेल रही हैं, अपितु पुरुष भी झेल रहे हैं। आज के समय में ऐसे अपराध भी सामने आ रहे हैं, जब आरोपी महिलाएं, पुरुषों को उन अपराधों की तरफ खींचती हैं। हनीट्रैप ऐसा ही अपराध है, साइबर क्राइम के अपराधों में महिलाओं को ही आगे रखा जा रहा है। घरों में आजकल महिलाओं की अपेक्षाएं भी बढ़ रही हैं, अब उस जमाने के मुताबिक घर-परिवार नहीं चल रहे, जब घर में जितना आ जाता था, उसी के अनुसार पूरा महीना निकालना होता था। अब बढ़ी हुई अपेक्षाएं पति-पत्नी दोनों को पूरा करना जरूरी हो गया है। दोनों अगर कार्यरत हैं तो दोनों की अपनी-अपनी दुनिया है।

जहां दोनों के अपने-अपने सर्कल हैं। जब दोनों में अहम का टकराव सामने आता है तो पारिवारिक झगड़े होते हैं, उनमें दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से वार करते हैं। लेकिन जिस प्रकार की घटनाएं रोजाना मीडिया में सामने आती हैं, उनके अनुसार ज्यादातर महिलाएं अब मामले को संभालने या फिर समस्या का हल निकालने के बजाय सोशल मीडिया आधारित आजादी का प्रयोग करते हुए उसे बढ़ावा देने में यकीन कर रही हैं।

अदालत के समक्ष कहा गया है कि साल 2021 में 33 प्रतिशत पुरुषों ने पारिवारिक समस्याओं और 4.8 फीसदी ने घरेलू कलह के कारण आत्महत्या कर ली। क्या देश में इसकी पड़ताल नहीं होनी चाहिए कि आखिर इतने पुरुषों ने आत्महत्या क्यों कर ली। बेशक, अगर यह कहा जाता है कि घरेलू कलह से हुआ तो यह आरोप भी हो सकता है, लेकिन अगर परिवार में ऐसा कुछ हुआ है तो फिर यह अनुसंधान का विषय होना ही चाहिए।

 माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह प्रश्न वाजिब है कि जो संख्या आत्महत्या करने वाले पुरुषों की बताई जा रही है उसके बारे में कैसे यकीन किया जाए कि पत्नी से परेशान होकर ही ऐसा किया गया है। अदालत का उलटे यह प्रश्न भी तथ्यपरक है कि कितनी महिलाओं को मौजूदा परिस्थितियों में आत्महत्या करनी पड़ रही है। यह कहा गया कि अगर एकतरफा तस्वीर पेश की जा रही है तो इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस संबंध में डेटा उपलब्ध कराने को कहा जिसके अनुसार पूछा गया कि कितनी महिलाएं शादी के महज तीन साल के अंदर मर रही हैं? निश्चित रूप से ऐसा कोई भी डेटा पुलिस के पास उपलब्ध नहीं होगा।

वास्तव में यह मामला पेचीदा है, सिर्फ यह कहना आज के समय में सही नहीं होगा कि अकेले महिलाएं ही प्रताडऩा का शिकार हो रही हैं, बेशक अब पुरुष भी प्रताड़ित हो रहे हैं। हालांकि प्रतिशत के मुताबिक महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा हो सकती है। निश्चित रूप से इसकी जरूरत है कि समाज में सभी की सुनवाई हो, पुरुषों की प्रताडऩा के मामलों को इस नजर से नहीं देखा जा सकता है कि यह पुरुष प्रभावी समाज है। अपराध स्त्री या पुरुष किसी के साथ भी घटे, उसके संबंध में अनुसंधान और कार्रवाई होनी ही चाहिए। 

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