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देश को कुंठा से नहीं, संविधान के बूते चलाने की जरूरत

शिवसेना का एक चरित्र यह भी है कि हुलड़बाजी और दबंगता दिखाते हुए अपनी बात को मनवाओ। हालांकि एक राजनीतिक दल के तौर पर बेशक ऐसा रवैया रख लिया जाए, लेकिन जब आप सत्ता में आ जाते हो तो आपको कहीं ज्यादा संवेदनशील और न्यायिक हो जाना होता है। उस समय सभी आपके लिए समान होते हैं और न्यायपूर्ण सोच के साथ शासन चलाना होता है। हालांकि महाराष्ट्र के इतिहास में बुधवार को शिवसेना के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने एक अभिनेत्री के कार्यालय पर जो गुंडागर्दी दिखाई है, वह बेहद लज्जित करने वाली और लोकतंत्र, संविधान एवं कानून का मखौल उड़ाने वाली है। बदले की भावना से की गई इस कार्रवाई ने तमाम नियम और कानूनों को ताक पर रख दिया। सत्ता सुख भोग रहे राजनीतिकों ने अपने अहंकार की तुष्टि के लिए बोलने की आजादी का दमन करते हुए एक महिला अभिनेत्री पर कार्रवाई करके यह जता दिया कि वे अवसरवादी राजनीति के पायदान पर टिके हैं, जिनकी कोई विचारधारा नहीं है, सिवाय इसके कि महाराष्ट्र में मराठी मानुष के नाम का जयघोष करते हुए क्षेत्रवाद की राजनीति को आगे बढ़ाते रहें। अभिनेत्री कंगना रणौत ने अपने बयानों से मुंबई में फिल्म माफिया की जहां पोल खोली है, वहीं इसी माफिया की मदद से राजनीति में पल्लवित पोषित हो रहे नेताओं को भी आईना दिखाया है। यही वजह है कि उनकी बातें सत्ताधारी गठबंधन की अगुवा शिवसेना को इतनी नागवार गुजरी कि बॉम्बे हाईकोर्ट में जारी सुनवाई की परवाह किए बगैर ही अभिनेत्री के कार्यालय को तहस-नहस कर दिया।
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बॉलीवुड जिस प्रकार दो खेमों में बंटा नजर आया, उसका उत्कर्ष अभिनेत्री कंगना रणौत के तीखे बयान और महाराष्ट्र सरकार से उनकी आमने-सामने की लड़ाई के रूप में दिखा है। कंगना के बयानों में बेशक कुछ अतिरेक नजर आए, लेकिन यह भी संभव है कि आम आदमी, एक आम मुंबईकर शायद ही इस फिल्मी दुनिया के अंदर वर्षों से जारी पाप और अनैतिक कृत्यों की सच्चाई को सामने लाने का साहस जुटा पाए। अभिनेत्री कंगना रणौत की आलोचना करने की कोई वजह नहीं दिखती, पीओके ऐसी ही जगह बन चुकी है, जहां मानवाधिकार, स्वतंत्र आवाज और स्वाभाविक उत्थान जैसी चीजें खत्म हो चुकी हैं। मुंबई भारत की ऐतिहासिक आर्थिक राजधानी है, यह देश को चलाती है, इसलिए इसके संदर्भ में कंगना की बात लागू नहीं होती, लेकिन मुंबई के अंदर फिल्मी दुनिया पर यह जरूर लागू होती है। इस फिल्मी दुनिया के अंदर इन्हीं हालात ने एक ऊर्जावान युवा अभिनेता की जान ले ली। वैसे, देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर अगर इन मामलों ने देश को मुंबई के प्रति जगा दिया है तो यह उचित ही है। पर्दे पर युवाओं के मॉडल बनने वाले अभिनेता, अभिनेत्रियों से यह उम्मीद की जानी ही चाहिए कि वे वही दिखेंगे जैसे वे हैं। देश एक बहुत भारी बदलाव से गुजर रहा है, ऐसे में सभी पक्षों में सुधार की जरूरत है, तब मुंबई फिल्म उद्योग इससे नहीं बच सकता। मौजूदा शिवसेना गठबंधन सरकार और इसके बाद आने वाली सरकारों के लिए मौजूदा प्रकरण एक सबक होना चाहिए।
बहरहाल, अभिनेत्री कंगना रणौत का मामला किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है। एक दिन पहले महज टीवी चैनलों पर बोलने वाली अभिनेत्री को रातोंरात वाई श्रेणी की सुरक्षा मिलना, उनका शिवसेना नेता की मुंबई आने की चुनौती के बीच वहां जाना, उनके कार्यालय में बीएमसी का चौबीस घंटे में कथित अवैध निर्माण के लिए जवाब मांगना और उसके पूरा होने से पहले ही सबकुछ तोड़ डालना, हाईकोर्ट के 30 सितंबर तक कार्रवाई न किए जाने के आदेश की पालना न करना आदि। क्या हमें यह समझ लेना चाहिए कि अब मुंबई में इसी प्रकार कथित कानून का शासन चलेगा। दिल्ली में बैठी कांग्रेस हाईकमान की ओर से इस संबंध में एक शब्द तक नहीं बोला गया है, क्या देश राजनीतिक खेमेबाजी में बंट गया है कि कौन भाजपा के साथ है और कौन कांग्रेस और उसके मित्र दलों के साथ। भाजपा की सरकारें किसी का साथ देंगी और विरोधी कानून को ठेंगा दिखाते हुए उस व्यक्ति को सबक सिखाएंगे। क्या यह नहीं होना चाहिए कि देश संविधान और कानून से चले। बोलने की आजादी अगर खत्म की जाएगी तो फिर पीओके जैसा बयान भी आएगा ही, इस बीच एक प्रदेश को अपनी वसीयत समझने वाले लोगों को ऐसे ही कड़वे बयानों का भी सामना करना पड़ेगा। वास्तव में हमें वही करना चाहिए जोकि संविधान में दर्ज है। प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता, उसके बोलने की आजादी का सम्मान होना चाहिए वहीं उन छिपे हुए रहस्यों का खुलासा भी जरूरी है जोकि इस देश की जड़ों को घुन की भांति खा रहे हैं।

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