SC Status Loss on Conversion: मुस्लिम या ईसाई बनने पर क्यों खत्म हो जाता है आरक्षण?

धर्म बदला तो 'कोटा' सफ़ाचट! जानिए क्यों मज़हब बदलते ही छिन जाता है SC का टैग?

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SC Status Loss on Conversion: मुस्लिम या ईसाई बनने पर क्यों खत्म हो जाता है आरक्षण?

News Desk: कहते हैं कि ऊपर वाले के घर में सब बराबर हैं, लेकिन कानून की गलियों में मामला थोड़ा पेचीदा है! अगर आप Scheduled Caste (SC) कैटेगरी में आते हैं और अपना धर्म बदलने का मन बना रहे हैं, तो रुकिए... पहले ये जान लीजिए कि आपके सर्टिफिकेट का 'पावर' बचेगा या धुआं हो जाएगा।

क्या है पूरा 'सियापा'?

सीधी बात ये है कि अगर कोई शख्स हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर मुस्लिम या ईसाई बनता है, तो उसे मिलने वाला SC का दर्जा और उससे जुड़े फायदे (जैसे आरक्षण) 'टा-टा, बाय-बाय' कह देते हैं।

अहम पहलु

  • संविधान का 'लक्ष्मण रेखा': 1950 का एक प्रेसिडेंशियल ऑर्डर साफ कहता है कि SC का दर्जा सिर्फ उन्हीं को मिलेगा जो हिंदू धर्म को मानते हैं। बाद में इसमें सिख (1956) और बौद्ध (1990) को भी जोड़ दिया गया।

  • ईसाई-मुस्लिम पर नो एंट्री: कानून की नज़र में इस्लाम और ईसाई धर्म में 'जातिवाद' या 'छुआछूत' जैसी सामाजिक बुराइयां (सैद्धांतिक रूप से) नहीं हैं। इसलिए, अगर आप वहां गए, तो सरकार मान लेती है कि अब आप पिछड़ें नहीं रहे!

  • कोर्ट की पैनी नज़र: अदालतों ने कई बार साफ किया है कि धर्म परिवर्तन एक व्यक्तिगत पसंद है, लेकिन इसके साथ मिलने वाले 'स्पेशल डिस्काउंट' (आरक्षण) को आप दूसरे धर्म में लेकर नहीं जा सकते।

 क्या घर वापसी से बात बनेगी?

जी हां! अगर कोई व्यक्ति वापस अपने मूल धर्म (हिंदू, सिख या बौद्ध) में लौट आता है और यह साबित कर देता है कि समाज ने उसे उसी पुरानी जाति के रूप में स्वीकार कर लिया है, तो उसका SC स्टेटस 'रीलोड' हो सकता है।


 'खतरनाक' ट्विस्ट!

यह बहस अभी भी ठंडी नहीं हुई है। कई लोग मांग कर रहे हैं कि दलित ईसाइयों और दलित मुस्लिमों को भी SC का दर्जा मिले, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि इससे असली हकदारों का हिस्सा बंट जाएगा। मामला अभी भी 'गरम तवे' की तरह अदालतों में चर्चा का विषय बना रहता है।

कोर्ट की कचहरी में इस मुद्दे पर ज़बरदस्त 'मिर्ची' लगी है! कानून की किताबों से छानकर पेश है वो ऐतिहासिक फैसले, जिन्होंने इस पूरे खेल के नियम तय किए हैं।

देखिए, जजों ने कब-कब क्या 'तड़का' लगाया:


कोर्ट के वो 'धमाकेदार' फैसले: जब छीना या मिला दर्जा

यहाँ कुछ ऐसे मुक़दमे हैं जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी:

केस का नाम कोर्ट का 'चटपटा' फैसला
सु्रिगल वर्सेस फ्रांसेस (1985) कोर्ट ने साफ कहा कि अगर कोई SC व्यक्ति ईसाई बनता है, तो वह आरक्षण का हक खो देगा। कोर्ट का तर्क था कि ईसाई धर्म में जातिवाद नहीं होता, इसलिए सुरक्षा की ज़रूरत नहीं।
कैलाश सोनकर वर्सेस माया देवी (1984) यह फैसला बड़ा 'रसीला' था! कोर्ट ने कहा कि अगर कोई धर्म बदलकर वापस हिंदू बनता है (घर वापसी), तो उसका SC दर्जा दोबारा जीवित हो सकता है, बशर्ते समाज उसे स्वीकार कर ले।
के.पी. मनु वर्सेस चेयरमैन (2015) इसमें सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगाई कि अगर किसी के दादा-परदादा ने धर्म बदला था, लेकिन वह खुद वापस अपने मूल धर्म में आकर अपनी जाति के रीति-रिवाजों को अपनाता है, तो उसे SC सर्टिफिकेट मिल सकता है

इन फैसलों के पीछे का 'सीक्रेट मसाला'

अदालतों ने समय-समय पर इन तीन बातों पर ज़ोर दिया है:

  1. ऐतिहासिक पिछड़ापन: कोर्ट मानता है कि हिंदू धर्म की 'छुआछूत' जैसी कुरीतियों से लड़ने के लिए आरक्षण दिया गया था। चूंकि इस्लाम और ईसाइयत में इसे आधिकारिक तौर पर नहीं माना जाता, इसलिए वहां कोटा 'फिट' नहीं बैठता।

  2. धर्म परिवर्तन का मतलब: कानून की नज़र में धर्म बदलना सिर्फ पूजा करने का तरीका बदलना नहीं है, बल्कि अपनी सामाजिक पहचान बदलना है।

  3. सबूत का खेल: अगर कोई वापस अपने धर्म में आता है, तो उसे कोर्ट में यह 'साबित' करना पड़ता है कि उसने अपनी पुरानी जाति और संस्कृति को कभी पूरी तरह छोड़ा नहीं था।

ताज़ा तरीन गर्मागर्मी (Current Status)

अभी सबसे बड़ा सस्पेंस 'रंगनाथ मिश्रा कमीशन' और 'बालकृष्णन कमीशन' की रिपोर्टों पर टिका है। सरकार और कोर्ट इस बात पर माथापच्ची कर रहे हैं कि क्या सदियों से पिछड़ रहे दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को भी SC लिस्ट में जगह मिलनी चाहिए या नहीं। यह मुद्दा किसी भी वक्त कानूनी गलियारों में नया 'धमाका' कर सकता है!