राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस: बुद्ध की धरती पर शांति, प्रेम और मानवता का संकल्प । डॉ. विक्रम चौरसिया
National Anti-Terrorism Day: A pledge for peace, love,
एक छोटा बच्चा अपने दादा से पूछता है “दुनिया में इतने युद्ध, हिंसा और नफरत क्यों हैं? क्या लोग प्रेम और शांति से नहीं रह सकते?”दादा मुस्कुराते हुए कहते हैं “बाबू, यही प्रश्न सदियों से मानवता के सामने रहा है। इसी धरती ने इसका उत्तर भी दिया है बुद्ध के रूप में, जिन्होंने करुणा, शांति और मध्यम मार्ग का संदेश दिया।”भारत केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि विचारों, मूल्यों और सभ्यता की जीवंत परंपरा है। यह वही पुण्यभूमि है जहाँ भगवान बुद्ध ने अहिंसा, करुणा और मैत्री का संदेश दिया; जहाँ महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को जनशक्ति में परिवर्तित किया; और जहाँ लोकतंत्र विविधताओं के बीच सह-अस्तित्व का आदर्श प्रस्तुत करता है।ऐसी पावन धरती पर 21 मई को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस केवल एक सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के मूल मूल्यों की पुनर्स्मृति है।
यह दिवस हमें याद दिलाता है कि आतंकवाद केवल बम, बंदूक और हिंसा तक सीमित नहीं, बल्कि मानवता, प्रेम, भाईचारे और लोकतांत्रिक चेतना पर सीधा आघात है।21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस दुखद घटना के बाद यह दिन आतंकवाद और हिंसा के विरुद्ध जागरूकता तथा राष्ट्रीय एकता के संकल्प के रूप में स्थापित हुआ।हालाँकि हिंसा केवल संगठित अपराध या आतंकवादी घटनाओं तक सीमित नहीं होती। जब समाज में जाति, धर्म, आर्थिक या सामाजिक आधार पर भेदभाव बढ़ता है, जब लोग स्वार्थवश छल, कपट, असत्य और धोखे का सहारा लेते हैं, तब सामाजिक सौहार्द और मानवीय विश्वास कमजोर पड़ने लगते हैं।
यह स्थिति समाज में वैमनस्य और असुरक्षा की भावना को जन्म देती है।विडंबना यह है कि मनुष्य अक्सर भूल जाता है कि जीवन क्षणभंगुर है। जन्म का समय निश्चित होता है, पर इस संसार से विदा लेने का कोई निश्चित क्षण नहीं। किसकी साँस कब अंतिम हो जाए, यह कोई नहीं जानता। अंततः सभी को मिट्टी में ही मिल जाना है कोई पहले, कोई बाद में। न धन साथ जाएगा, न पद, न प्रतिष्ठा, न अहंकार।जब अंतिम सत्य मिट्टी है, तब जीवन को नफरत, छल और विभाजन में क्यों व्यर्थ किया जाए? दुनिया को सुंदर बनाने वाली शक्ति सत्ता या संपत्ति नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान, स्नेह और मानवीय संवेदनाएँ हैं। बुद्ध की धरती हमें सिखाती है कि क्रोध को प्रेम से जीता जा सकता है।
गांधी का भारत बताता है कि सबसे बड़ी शक्ति हिंसा में नहीं, बल्कि आत्मबल, सत्य और नैतिक साहस में है।आज राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस पर आवश्यकता केवल औपचारिक शपथ लेने की नहीं, बल्कि अपने भीतर यह संकल्प जगाने की है कि हम समाज में प्रेम, भाईचारा, समानता और लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करेंगे।जब दुनिया हिंसा और अविश्वास की आग में झुलस रही हो, तब भारत को पुनः बुद्ध, गांधी और संविधान की रोशनी बनना होगा। यही इस दिवस का वास्तविक संदेश है ,नफरत नहीं, संवाद।हिंसा नहीं, अहिंसा।
आतंक नहीं, मानवता।अंततः यही कहना उचित होगा
“राष्ट्रहित और मानवता ही सर्वोपरि।”
चिंतक/ मेंटर/एक्टिविस्ट/दिल्ली विश्वविद्यालय