असम में JMM की 'धमक': बिना गठबंधन 16 सीटों पर लड़ा चुनाव, हेमंत सोरेन बोले— "यह अधिकारों की लड़ाई की शुरुआत है"

असम में JMM की 'धमक': बिना गठबंधन 16 सीटों पर लड़ा चुनाव, हेमंत सोरेन बोले— "यह अधिकारों की लड़ाई की शुरुआत है"

Hemant Soren Declares—

Hemant Soren Declares—"This Marks the Beginning of the Fight for Rights"

रांची। Hemant Soren Declares—"This Marks the Beginning of the Fight for Rights", असम विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की एंट्री ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। सीमित संसाधनों और कम समय के बावजूद पार्टी को कई सीटों पर उल्लेखनीय समर्थन मिला है। इस प्रदर्शन को झामुमो के लिए एक अहम राजनीतिक शुरुआत मानी जा रही है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम की जनता के प्रति आभार जताते हुए कहा है कि इतने कम समय और सीमित संसाधनों में जो कुछ भी संभव हो सका, वह जनता के सहयोग, विश्वास और सक्रिय भागीदारी का परिणाम है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि असम की जनता का समर्थन केवल सहयोग नहीं, बल्कि पार्टी के लिए हौसला बढ़ाने वाला है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की सराहना करते हुए कहा कि उनके समर्पण और मेहनत ने इस अभियान को मजबूती प्रदान की है।

असम में JMM ने उतारे 16 उम्मीदवार

झामुमो ने असम में कुल 16 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। पहली ही कोशिश में पार्टी ने दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रहते हुए कड़ा मुकाबला किया, जबकि सात सीटों पर 15 हजार से अधिक मत प्राप्त किए। कई अन्य सीटों पर भी पार्टी ने उल्लेखनीय वोट हासिल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

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मजबत में 29,172, भेरगांव में 21,997, गोसाईगांव में 20,831 और रंगापारा में 20,301 वोट प्राप्त हुए। इसके अलावा डिगबोई, मार्गेरिटा, खुमताई और सोनारी जैसी सीटों पर भी पार्टी को अच्छी प्रतिक्रिया मिली।

यह आंकड़े संकेत देते हैं कि झामुमो ने सीमित संसाधनों के बावजूद मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी है।

सामाजिक मुद्दों के सहारे बनाई पहचान

असम में चुनाव लड़ने का फैसला झामुमो के लिए केवल राजनीतिक विस्तार नहीं था, बल्कि आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की रणनीति का हिस्सा भी था।

राज्य में आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा न मिलना, चाय बागान मजदूरों की कम मजदूरी और भूमि अधिकार जैसे मुद्दों को पार्टी ने प्रमुखता से उठाया। इन सामाजिक-आर्थिक मुद्दों ने झामुमो को एक अलग पहचान दिलाई और मतदाताओं के बीच भरोसा बनाने में मदद की।

बिना गठबंधन के भी दिखी ताकत

झामुमो ने असम में बिना किसी बड़े गठबंधन के चुनाव लड़ते हुए अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी। यह रणनीति जोखिम भरी मानी जा रही थी, लेकिन परिणामों ने संकेत दिया कि पार्टी का यह प्रयोग पूरी तरह विफल नहीं रहा। इस प्रदर्शन ने झामुमो के लिए पूर्वोत्तर में संभावनाओं के नए दरवाजे खोले हैं।

आने वाले समय में संगठन के विस्तार और मजबूत रणनीति के साथ पार्टी यहां अपनी स्थिति और मजबूत कर सकती है।

हेमंत सोरेन ने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि यह केवल चुनावी प्रयास नहीं, बल्कि अस्तित्व, पहचान और अधिकारों की लड़ाई है। असम की जनता का समर्थन पार्टी के लिए प्रेरणा और नई ऊर्जा का स्रोत है और यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।