खिलाड़ी खेलते हुए ही अच्छे, विवादों का समाधान जरूरी
Monday, August 20, 2018
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खिलाड़ी खेलते हुए ही अच्छे, विवादों का समाधान जरूरी

खिलाड़ी खेलते हुए ही अच्छे, विवादों का समाधान जरूरी

एक जमाना था, जब बच्चे अगर पढ़ते नहीं थे, तो उन्हें कहा जाता था- खेलोगे-कूदोगे होओगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब। हालांकि अब वक्त बदल गया है, और ऐसा बदला है कि खेल और खिलाड़ी अब देश की शान हो गए हैं। उनके लिए अब सुविधाएं बढ़ गई हैं, लेकिन इसके बदले में खिलाडिय़ों की मेहनत भी रंग लाने लगी है। इस वर्ष अप्रैल में हुए 21वें कॉमनवेल्थ खेलों में भारत ने कुल 66 पदक जीते हैं, जिसमें 26 गोल्ड, 20 सिल्वर और 20 ब्रॉन्ज मेडल शामिल है। भारत इन पदकों के साथ मेडल लिस्ट में तीसरे स्थान पर रहा। इससे पहले 2010 दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने सर्वाधिक 38 गोल्ड मेडल जीते थे। इन 26 गोल्ड मैडल्स में से 9 सिर्फ हरियाणा के खिलाडिय़ों ने जीते हैं, प्रदेश के खिलाडिय़ों ने कुल 22 पदक देश की झोली में डाले हैं।

हरियाणा में आजकल मैडल जीतकर लौटे खिलाडिय़ों की इनामी राशि को लेकर वार-तकरार शुरू हो रखी है। सरकार उनके संबंध में एक निर्णय लेती है और वह इस कदर विवादित हो जाता है कि तुरंत उसे वापस ले लिया जाता है। कॉमनवेल्थ गेम्स के समापन के तुरंत बाद विजेता खिलाडिय़ों का सम्मान समारोह आयोजित करने का फैसला हुआ था, लेकिन इस दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि जो खिलाड़ी हरियाणा की ओर से खेले हैं, उन्हें पूरी सम्मान राशि दी जाएगी वहीं जो दूसरे विभागों की ओर से खेल हैं, उन्हें संबंधित विभाग की ओर से मिली इनामी राशि को काटकर दिया जाएगा। इसका उन खिलाडिय़ों ने पुरजोर विरोध किया जोकि केंद्र सरकार के विभागों की ओर से खेल रहे हैं। ऐसे में यह सम्मान समारोह अब तक नहीं हो सका है, और हालात ऐसे हैं कि आगे भी इसके होने की संभावना नहीं है।

इससे खिलाडिय़ों में आक्रोश है, उनका कहना है कि जब वे देश के लिए सम्मान अर्जित कर रहे हैं तो फिर सरकार उनके साथ भेदभाव क्यों कर रही है। हालांकि राज्य सरकार का यही कहना है कि आप जब प्रदेश की ओर से नहीं खेले हो तो आपको कैसे वह इनामी राशि दी जा सकती है, ऐसे में संबंधित विभाग की ओर से देय राशि में से कटौती करके आपको यानी खिलाड़ी को दी जाएगी। पूरा विवाद यही है।
इस बीच एक नये फैसले ने जिसे बाद में सरकार वापस भी ले चुकी है, सरकार और खिलाडिय़ों के बीच दूरी बढ़ा दी है। 30 अप्रैल को अधिसूचित किया गया एक फैसला इसी सप्ताह प्रकाश में आया है, जिसके बाद विवाद गहरा गया है।

इस फैसले के तहत वे खिलाड़ी जोकि सरकारी नौकरी में रहते हुए पेशेवर खेल खेल रहे हैं, तो उन्हें अपनी सौ फीसदी कमाई खेल कल्याण फंड में जमा करानी होगी, वहीं वे खिलाड़ी जो सरकारी नौकरी में रहते हुए बगैर वेतन अवकाश लेकर पेशेवर खेल खेलते हैं, उन्हें अपनी कमाई का एक तिहाई खेल कल्याण कोष में जमा कराना होगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब प्रदेश के खिलाड़ी खेल विभाग के पहले वाले निर्णय से ही बेहद खफा हुए बैठे हैं। इस दूसरे फैसले को जारी करने के पीछे सरकार की ओर से हाईकोर्ट के एक मामले में इसके निर्देश जारी करने को ढाल बनाया गया है।

बीते दिनों कैथल में जनसंपर्क अभियान के तहत मुख्यमंत्री से जब इस दूसरे फैसले के संबंध में मीडिया ने सवाल पूछा था तो वे जवाब नहीं दे पाए थे, इसके बाद शाम होते-होते यह निर्देश खारिज करने के आदेश पारित हो गए थे। सवाल है आखिर सरकार और खिलाडिय़ों के बीच यह युद्ध कैसे शांत होगा। अब खेल विभाग के अधिकारी और खिलाडिय़ों के बीच टिवटर पर शब्दयुद्ध शुरू है। इसमें जहां खिलाड़ी अधिकारियों को खेल की अहमियत और मैडल हासिल करने के लिए पसीना बहाने की क्षमता का पाठ पढ़ा रहे हैं, वहीं अधिकारी भी खिलाडिय़ों को अपनी हद में रहने और संयम का सबक दे रहे हैं।

जाहिर है, यह लड़ाई आत्मसम्मान की भी है, अभी तक तो हालात ये थे कि कभी-कभार और इक्का-दुक्का मैडल आ जाता था, तो सम्मान की राशि देने और सम्मानित करने में सरकार को परेशानी नहीं होती थी, लेकिन भाजपा सरकार ने खिलाडिय़ों के लिए खेल नीति भी तैयार कर दी है, ऐसे में सब कुछ नीति के तहत अंजाम देने की कोशिश है।

यह मामला राजनीतिक रंग भी ले रहा है, जब सरकार के मुखिया राज्य में फिर से बहुमत हासिल करने के दावे कर रहे हों, तो शायद खिलाडिय़ों के साथ विवाद सरकार की अच्छी छवि कायम होने से रोकता है। जनता भी इसे नकारात्मक रूप से देखती है, वहीं विपक्ष को अपने हमले तेज करने का मौका मिलता है। जाहिर है, इस मामले का कोई सर्वमान्य हल जहां खिलाडिय़ों को उनका आत्मसम्मान लौटाएगा वहीं सरकार जोकि कोर्ट के आदेश की दलील दे रही है, के लिए भी यह बचावकारी होगा।

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