Gandhibabu Moolchand Jain of Haryana was the pioneer of life values
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Gandhibabu Moolchand Jain of Haryana was the pioneer of life values

जीवन मूल्यों के पुरोधा थे हरियाणा के गांधीबाबू मूलचंद जैन

महान स्वतंत्रता सेनानी हरियाणा के गाँधी बाबू मूल चंद जैन की 25 वीं पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि।

हरियाणा वह भूमि  है, जहां महाभारत का धर्मयुद्ध हुआ। लेकिन यह वह भूमि भी है, जिसने अनेक अमर स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया, जिन्होंने अपने आत्मबल से विपरीत हालात में अंग्रेजी शासन के खिलाफ युद्ध जारी रखा। अहिंसा के मूल मंत्र पर चलते हुए वे जेल गए और यातनाओं को झेला। उन्हीं महान व्यक्तित्वों में से एक नाम बाबू मूल चंद जैन का भी है,जिनके नाम पर गत 13 अक्टूबर, 2021 को भारत सरकार के डाक-विभाग की ओर से रोहतक पोस्टल डिविजन द्वारा एक भव्य समारोह आयोजित कर विशेष डाक-कवर रिलीज कर 'हरियाणा के गाँधी' उपाधि से सम्मानित किया और उनके सभी परिवारजनों को सम्माणित किया गया था। क्योंकि गांधी जी खुद त्याग, संघर्ष और तप का पर्याय थे, ऐसे में हरियाणा का गांधी कह कर किसी को बुलाया जाता है तो इसका अर्थ है कि उनका खुद का जीवन कितना संघर्षपूर्ण रहा होगा, बावजूद इसके उन्होंने अपने निजी सुख, आराम, परिवार और सगे संबंधियों की परवाह नहीं, उन्होंने अगर परवाह की तो देश की आजादी की उस चाह की, जोकि गुलामी के दौर में प्रत्येक भारतीय के दिल में मशाल की भांति जल रही थी।  

एक प्रसंग है, यह वर्ष 6 मार्च 1941 की बात है। बाबू मूलचंद जैन ने सोनीपत के अपने गांव सिकंदरपुर माजरा में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। उनके आह्वान पर ग्रामीण इककठे हुए। वे डीसी रोहतक को पहले ही इसकी सूचना दे चुके थे, इसलिए भारी पुलिस बल भी मौके पर जमा था। उन्होंने अपनी बात कहनी शुरू ही की थी कि पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके सगे संबंधी और ग्रामीण यह देखकर कर चिंतित हो गए, लेकिन बाबू जी के चेहरे पर अदम्य चमक थी। यह चमक देश के काम आने की थी। ब्रिटिश अदालत ने उन्हें एक साल जेल की सजा सुनाई। आजादी के क्रांतिवीर बाबू जी जहां अंग्रेजों से लड़ रहे थे वहीं उन्हें पारिवारिक मोर्चे पर भी एक युद्ध को लडऩा पड़ रहा था। इन्हीं पलों में कुछ ऐसा दुखद भी घटने वाला था, जिसका अहसास किसी को नहीं था।

15 फरवरी 1939 को बाबू जी की बेटी सावित्री का जन्म हुआ, लेकिन अपनी पत्नी और3 दिन कीनवजात बेटी के प्रति जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए वे आसौदा के जलसे में शामिल हुए। यहां जमींदार लीग के लोगों ने बहकावे में आकर आंदोलनकारियों पर गँडासों-भालों सेहमला कर दिया, जिसमें 100 के करीब आंदोलनकारी गंभीर जख्मी हो गए। और बाबूजीको मरणासन्न हालत मे छोड़ गए) तब यह शोर मच गया कि गोहाना का वकील मारा गया। हालांकि बहादुरगढ़ के अस्पताल में उनका इलाज चला और वे स्वस्थ हो गए। इस घटना ने पूरे देश में ललकार पैदा कर दी और 7 मार्च 1939 को उसी आसौदा में फिर जनसभाहुई और स्वतंत्रता सेनानी श्रीमतीसरोजिनी नायडू ने वहां पहुंच कर अपना भाषण दिया।    बाबू जी को जेल हो गई, लेकिन परिवार में रूढि़वादी रवैये के तहत किसी ने इसके लिए उनकी पत्नी को जिम्मेदार ठहराते हुए उनके तीन बच्चों और पत्नी को घर से बाहर कर दिया। यह कितने पीड़ादायक क्षण होंगे, इसका सहज अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। उनके समक्ष एक तरफ परिवार था और दूसरी ओर आजादी की जंग। उन्होंने आजादी की लड़ाई को चुना। वर्षों बाद जब हम उसी आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, तब उन क्षणों का अहसास कर सकते हैं, जब किसी महिला का पति जेल भेज दिया गया हो और उसे परिवार ने बच्चों के साथ घर से निकाल दिया हो। जाहिर है, इस लड़ाई में बाबू मूल चंद जैन की पत्नी का भी बराबर सहयोग रहा।

बाबू जी अपने अदालत के कार्य के बाद साइकिल से आसपास के गांवों में जाकर लोगों को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित करते थे। गौरतलब यह भी है कि बाबू जी का यह जुनून परिवार के लोगों को शुरुआत में महज उनका फितुर नजर आता था। लेकिन आसौदा की घटना के बाद बहुत कुछ बदल गया। यह बाबू जी का दृढ़ संकल्प ही था कि उनके पिता लाला मुरारी लाल जैन ने उन्हें न केवल आशीर्वाद दिया अपितु उन्होंने प्रोत्साहित करते हुए कहा था- तुम देश और धर्म के काम में जुट गए हो तो अब पीछे नहीं हटना। जाहिर है, यही बात उनकी प्रेरणा का महान स्त्रोत थी।

1941 में सत्याग्रह आंदोलन के चलते उन्हें जेल हुई लेकिन सितंबर 1941 में उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। गुजरात जेल में उन्हें करनाल के इलाके के भी कई स्वतंत्रता सेनानी मिले थे, जिन्होंने करनाल को अपनी कर्मभूमि बनाने का बाबूजी को सुझाव दिया। जेल से बाहर आकर उन्होंने परिजनों से इस संबंध में चर्चा की और फिर करनाल आ गए। यहां उन्होंने वकालत करते हुए आजादी की जंग को जारी रखा। करनाल उनके लिए नई जगह थी, लेकिन अपने प्रभावी जनसंपर्क और आजादी के प्रति जुनून को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इलाके के लोगों को व्यापक स्तर पर आंदोलित किया। उन्होंने देशहित के लिए अपने निजी हितों को कोई महत्व नहीं दिया और करनाल के लोगों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। 

वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की देश में गूंज हो गई। बाबू जी ने भी इस आंदोलन के लिए अपनी कमर कस ली थी, उन्होंने एक पत्र अपनी ससुराल पक्ष को लिखा कि अपनी बेटी को ले जाएं। इसके कुछ दिन बाद ही उन्हें करनाल की कचहरी से गिरफ्तार कर लिया गया। बाबू जी पर मुकदमा नहीं चला, लेकिन उन्हें मुलतान सेंट्रल जेल में नजरबंद कर दिया गया।  जेल में गांधी टोपी पहनने पर रोक थी, लेकिन बाबू जी ने साफ कहा कि वे गांधी टोपी पहनना बंद नहीं करेंगे चाहे उन्हें कितनी भी सजा हो जाए। यह उनके आदर्श और संकल्प थे, जिनके लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। उन्होंने गांधी टोपी के लिए जेल के कपड़े पहनना स्वीकार कर लिया था, हालांकि उनसे पहले कई आंदोलनकारियों ने जेल के नियम स्वीकार कर लिए थे।  
 

आखिरकार 15 अगस्त 1947 की वह सुबह आ ही गई, जिसका पूरे देश को इंतजार था। असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष रंग लाया था और देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो चुका था। इस बीच देशभर में चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई। वर्ष 1952 में संयुक्त पंजाब में पहला विधानसभा चुनाव हुआ और बाबूजी को समालखा से कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी धर्म सिंह राठी को कड़े मुकाबले में हरा दिया। जनसेवा के अपने इस नवीन अभियान के दौरान वे पिछड़े, गरीब और अजा वर्ग के लोगों से बड़ी शिद्दत से मिलते। चौपाल सजती और वहीं सबके सामने वे जन-सुनवाई करते। अपने विरोधी ग्रुप के लोगों से उन्होंने कभी पक्षपात नहीं किया और ना ही कभी बदले की भवन से उनके कार्यों मे बढ़ पहुंचाई। गांव में आपसी भाईचारा और सौहार्द बढ़ाने में एक संवेदनशील राजनेता का कितना योगदान हो सकता है, यह बाबू जी ने सिद्ध करके दिखा दिया था। आज के राजनेताओं को बाबू जी का यह जीवन सीख प्रदान करता है, वहीं समाज को भी चरित्रवान और अपने संकल्पों को पूरा करने के लिए दिलो जान से जुटे रहने की प्रेरणा देता है। आखिरउन्हें हरियाणा का गांधी यूं ही तो नहीं कहा जाता बल्कि यहउपाधि बाबूजी के इन्हीं सब गुणों से सार्थक साबित होती है। उनके बारे उनके हल्के के लोगों द्वारा यह भी कहा जाता है कि 'बाबू जी के अपने क्षेत्र में इतने उपकार हैं कि यहां के दरख्त यानी पेड़ भी उनका नाम सुनकर प्रसन्न चित्त हो जाते हैं'।  

वर्ष 1956 में पंजाब विधानसभा में गवर्नर के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को पेश करने की जिम्मेदारी बाबू जी को मिली और उन्होंने इसमें अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उस समय के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने उनके संबंध में हरियाणा के अपने एक सहयोगी से पूछा- 'यह हीरा अब तक कहां छिपा रखा था?' इसके बाद बाबू जी को मंत्री बना दिया गया, उन्हें विभाग भी जनसेवा के ही मिले। लोक निर्माण, सड़क, भवन और कराधान विभागों के जरिए उन्होंने उल्लेखनीय कार्य संपन्न कराए। उनकी सोच और दूरदृष्टि ने संयुक्त पंजाब में विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किए। उन्होंने गोहाना से दिल्ली तक पक्की सडक़ का निर्माण कराया, जिसे अभी भी याद रखा जाता है। वर्ष 1957 में बाबू जी ने कैथल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और वे केवलमात्र 4000 रुपए खर्च कर भरी बहुमत से जीते।

 बाबू जी राजनीति में व्यापक भ्रष्टाचार, अपराधीकरण एवं केंद्र व राज्यों की सरकारों की अस्थिरता से बहुत दुखी और आहत होते थे, वे यही सोचते रहते थे कि इस देश को कैसे बचाया जा सकता है? इस संबंध में उन्होंने दूसरे देशों के संविधान का भी अध्ययन किया वहीं देश में ही बुद्धिजीवियों के बीच चिंतन शुरू किया। उन्होंने संसदीय प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली वाली सरकार अपनाने की बहस को छेड़ा। लेकिन 12 सितंबर 1997 को यह बहस बीच में ही छूट गई, क्योंकि बाबू जी का साथ उनकी श्वासों ने छोड़ दिया था।

बाबू मूलचंद जैन वह व्यक्तित्व थे, जोकि सदैव हरियाणा और देश के लोगों की यादों में महकते रहेंगे। वे जीवन मूल्यों के पुरोधा थे। उनका समाज और देश को योगदान अमूल्य है, वे गांधीवादी सोच रखते हुए गरीब, जरूरतमंद, पिछड़े और अजा वर्ग के लोगों के लिए सदैव तत्पर रहे। उनका जीवन दर्पण की भांति स्पष्ट और उजला रहा।

आज उनकी 25वी पुण्यतिथि पर उन्हें सादर श्रद्धांजलि।