हरियाणा में बसपा लोसुपा का साथ आना - Arth Parkash
Tuesday, February 19, 2019
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हरियाणा में बसपा लोसुपा का साथ आना

हरियाणा में बसपा लोसुपा का साथ आना

हरियाणा की राजनीति में एक नये गठजोड़ ने हलचल मचा दी है। इनेलो के बुरे दिन खत्म होने के बजाय और बढ़ गए। परिवार में टूट हो गई, भाई-भाई अलग हो गए और पिता ने एक बेटे और उनके पुत्रों को निकाला दे दिया। जनता ने भी नजरें फेर ली, और अब जिसके सहारे राजनीतिक भंवर को पार करने की सोची थी, वह ‘बहन’ भी विमुख हो गई। इनेलो के साथ करीब 9 महीने साथ चलने वाली बसपा ने उसका साथ छोड़कर नवोदित और एक पार्टी के सांसद होने के बावजूद अपनी पार्टी खड़ी करने वाले नेता के साथ चलने का फैसला लेकर वाकई हिम्मत और नायाब राजनीतिक संरचना का नमूना पेश किया है। बसपा और सांसद राजकुमार सैनी की पार्टी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के बीच हुआ गठजोड़ ऐसे नेताओं का साथ आना है जोकि समाज के निम्न वर्गों की वकालत करते हैं और आने वाले चुनाव में उन्हीं के सहारे सत्ता हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।

वास्तव में अब यह बात पुरानी हो गई है कि आखिर बसपा ने इनेलो का साथ क्यों छोड़ा। बसपा सुप्रीमो मायावती इनेलो के साथ इसलिए आई थी, क्योंकि गत चुनाव में इनेलो ही वह पार्टी थी जोकि दूसरे नंबर पर रही थी, इसके बाद उसे ही विधानसभा में नेताप्रतिपक्ष की कुर्सी मिली थी, इसके बाद सबकुछ ठीक चल रहा था। लेकिन इनेलो के जींद से विधायक डा हरीचंद मिड्ढा के देहांत के बाद समीकरण बदलते गए। वहीं इनेलो परिवार के अंदर एकाएक दरार पैदा होने और उसके खाई बनने से बसपा के मन में संशय पैदा होना शुरू हो गया। यह संशय तब और गहरा हो गया जब उपचुनाव में इनेलो उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई। इसके बाद पार्टी को यकीन हो गया कि उसका इनेलो के साथ चलना उसके लिए हानिकारक होगा। हालांकि इस बीच एक और बड़ी वजह बताई जा रही है कि हरियाणा में जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बसपा ने कांग्रेस के एससी और बीसी वोट को अपने पाले में लाने की योजना बनाई। उपचुनाव में क्योंकि कांग्रेस को भी करारी शिकस्त मिली इसलिए उसके लिए इन वर्गों की सहानुभूति हासिल करना भी सहज हो गया। गौरतलब है कि बसपा की ओर से कहा गया है कि उपचुनाव में इनेलो उम्मीदवार को जितने वोट मिले, उनमें से आधे से ज्यादा बसपा की वजह से उसे मिले।

खैर, बसपा और लोसुपा के साथ आने से क्या नया घटित होगा, इसका सिर्फ आकलन किया जा सकता है। हालांकि जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान जाटों के खिलाफ तीखे बयानों के बाद बीसी समाज की सहानुभूति हासिल करने वाले सांसद राजकुमार सैनी के लिए बसपा जैसी पार्टी जोकि एससी, मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्ग की पैरोकार है, के साथ चलना मुनासिब था। यह दरअसल, दो ऐसे दलों का साथ आना है जोकि अपने-अपने वर्गों के हितों के लिए सवर्णों से टक्कर लेने का जज्बा और साहस रखते हैं। इस गठबंधन को किसी भी अन्य दल के लिए हल्के में लेना मुनासिब नहीं रहेगा। हरियाणा में इससे पहले दलितों के लिए कांग्रेस ही एकमात्र सहारा नजर आती थी, लेकिन अब उसे एक विकल्प मिल गया है। सत्ताधारी भाजपा जोकि सभी वर्गों के बीच समन्वय बनाकर आगे बढऩे का दावा कर रही है, के लिए भी यह चुनौती होगा। हालांकि गठबंधन के बाद बसपा का हाथ उपर हो गया है, इससे पहले वह पीछे चलने को मजबूर थी, लेकिन अब वह आगे चलेगी। यही वजह है कि लोकसभा की 10 सीटों में 8 पर बसपा ने लडऩे की ठानी है वहीं 2 सीट लोसुपा के हिस्से आई है। वहीं विधानसभा में 90 में से 55 सीटें लोसुपा को मिली हैं और 35 बसपा ने रखी हैं।

हरियाणा की जनता राजनीतिक रूप से बेहद परिपक्व हो चुकी है। इन बीते वर्षों में प्रदेश ने बहुत कुछ झेला है। जातीय संघर्ष का सबसे बुरा दौर भी लोगों ने देखा है। सांसद राजकुमार सैनी ने अपने बयानों से दलित और पिछड़े वर्गों के नेता के रूप में अपनी छवि बनाई है, वे प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने और अन्य सामाजिक सुधार की घोषणाएं भी करते रहे हैं, वहीं बसपा के लिए लंबे समय बाद हरियाणा में खुलकर जौहर दिखाने का मौका मिलेगा। इस गठबंधन के बाद जाहिर है कि अब राज्य में भाजपा, कांग्रेस, इनेलो, जजपा और बसपा-लोसुपा गठबंधन के बीच सियासी महाभारत होगा। मेयर चुनाव और उसके जींद उपचुनाव में कामयाबी की दास्तां लिख चुकी भाजपा के लिए अपने सफर को बनाए रखना चुनौती होगी, हालांकि कांग्रेस और इनेलो जैसे दलों को अपना मनोबल फिर से जुटाना होगा।

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