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अपनी मनोदशा को बदल कर आगे बढ़े : मुनिश्री विनय कुमार जी

नकारात्मक और छोटी मनोदशाओं से बचने के लिए अपने आत्मविश्वास को बढ़ाना चाहिए, जब हमारे आत्मविश्वास में कमी आती है, तो हमारे भय का जन्म होता है। इसका हमें कोई सटीक आभास नहीं होता है कि भविष्य में क्या होगा, लेकिन हम अक्सर इसे लेकर मन ही मन बहुत कुछ सोचने लगते हैं। ऐसे में यदि हमारे विचार सकारात्मक होते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास बढ़ जाता है, लेकिन जब हम अंजाम के बारे में नकारात्मक बातें सोचने लगते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास डिगने लगता है और जाने-अनजाने हम भय के जाल में फंस जाते हैं।

इस स्थिति में मनुष्य के लिए भय को अनदेखा करना आसान नहीं होता, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह भय का सामना ही न कर पाए। पने तक ही सीमित हो जाना, उस प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करता है, जो सर्वहित में चल रही होती है। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 24सी अणुव्रत भवन तुलसी सभागार मे नवान्हिनक अध्यात्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत सभा को संबोधित करते हुए कहे।

मनीषी श्रीसंत ने आगे कहा अगर मनोदशा नकारात्मक के शिख्ररो को छू रही है तो जीवन ग्रत की ओर घसीटता चला जाता है और अंत में वह गहरे गढ्ढïे में गिर कर अपनी अंतिम सांसे गिन रहा होता है। मनुष्य को थोड़ा साहस जरूर दिखाना पड़ता है। जान लीजिए कि जो डर से डर गया, वह मर गया वरना डर के आगे जीत है। डर और साहस का एक संबंध है, क्योंकि साहस का न होना ही डर के पैदा होने का कारण होता है। साहस एक ऐसी शक्ति है, जिसके सामने डर अपना सब कुछ खो देता है।

मनुष्य को सर्वप्रथम अपने भय की पहचान करनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि अपने भय को पहचाने बगैर हम कभी उससे छुटकारा नहीं पा सकते। जिस बात या कार्य से आपको भय लग रहा है, उस कार्य को बार-बार करें। इसके बावजूद आपका भय कायम है, तो उस कार्य को तब तक करते रहें, जब तक आपका भय पूरी तरह से भाग न जाए। आप जितनी बार भय देने वाले कार्य को करेंगे, उतनी आपकी हिम्मत बढ़ती जाएगी। एक समय ऐसा जरूर आएगा, जब आपके भय को उलटे पैर भागना ही पड़ेगा। वैसे यह दुनिया बड़ी मनोरम और सुंदर है, इसमें भय जैसा कुछ भी नहीं है। भय तो हमारे ही मन की एक स्थिति है।

मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया मनुष्य लेना बहुत कुछ चाहता है, किंतु देना कुछ नहीं चाहता। यह एक तरह की अकर्मण्यता भी है। इसी कारण आज समस्याओं के अंबार लग गए हैं। यह समझना होगा कि मनुष्य वास्तव में वह भौतिक स्वरूप नहीं है, जो दिख रहा है। मनुष्य एक अंतर्चेतना है, जो उसके भौतिक स्वरूप को सजीव और गतिशील कर रही है। उसकी अंतर्चेतना एक व्यापक चेतना का अंग है, जो सभी जीवों में अपना अंश समाहित करती है। यह अदृश्य संबंध ही सर्वहित का आधार है। इस संबंध को निभाना अधिक महत्वपूर्ण है।

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