स्कूल-कॉलेजों में अनिवार्य हो सकती है व्यापक सेक्स एजुकेशन, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में पेश किया ब्लूप्रिंट
Centre Submits Blueprint for
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश के स्कूलों और कॉलेजों में व्यापक (कम्प्रीहेंसिव) सेक्स एजुकेशन लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। सरकार ने अदालत के समक्ष एक चरणबद्ध ब्लूप्रिंट प्रस्तुत किया है, जिसमें विभिन्न आयु वर्ग के छात्रों के लिए वैज्ञानिक और आयु-उपयुक्त यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।
यह ब्लूप्रिंट महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव की अध्यक्षता वाली 26 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर आधारित है। समिति में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों के अधिकारी, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) तथा नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) के प्रतिनिधि शामिल थे।
सरकार के अनुसार, प्रस्तावित पाठ्यक्रम को विद्यार्थियों की आयु और समझ के अनुसार अलग-अलग स्तरों में विभाजित किया गया है। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को 'गुड टच' और 'बैड टच' के बीच अंतर समझाया जाएगा। मिडिल और हाई स्कूल स्तर पर हार्मोनल और शारीरिक बदलाव, प्रजनन स्वास्थ्य, जेंडर संवेदनशीलता तथा आपसी रिश्तों में सहमति (Consent) के कानूनी और नैतिक महत्व की जानकारी दी जाएगी। वहीं, कॉलेज स्तर पर भी इसे अनिवार्य रूप से लागू करने का प्रस्ताव है, ताकि युवाओं को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक बनाया जा सके।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यह पहल 2025 में अदालत द्वारा पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत किशोरों के आपसी सहमति वाले संबंधों के अपराधीकरण और नाबालिग लड़कियों में बढ़ती गर्भधारण की घटनाओं पर जताई गई चिंता के बाद गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर आधारित है।
सोमवार को जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ के समक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सरकार की ओर से इस प्रस्ताव की जानकारी दी। मामले पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही होगा।