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मन की सुन्दरता ही हमें इन्सानी रूप प्रदान करती है: निरंकारी बाबा

घडिय़ां-लम्हें-पल जिसको हम समय कहते हैं, यह तो अपनी रफ्तार से चलता चला जाता है लेकिन उन्हीं घडियों, उन्हीं लम्हों को मुबारक बनाया जा सकता है जिन्हें हम अपने हृदय के भक्ति वाले भाव बना लेते हैं। जब हमारे हृदय में समर्पण भाव आ जाता है, जब हम इस प्रभु के अहसास में डूब जाते हें तब वो घडयि़ां, वो लम्हें, वो पल-क्षण जो बीतते हैं वो सुन्दर होते हैं।

कई दफा दास ने दोहराया कि जब इस नई सदी का आगमन हुआ, जब सन 2000 में हमने प्रवेश किया तो उस वक्त एक नारा मिशन के मंच से दिया गया-
युग सुन्दर सदियां सुन्दर, हर पल सुन्दर,
गर मानव जीवन हो सुन्दर।

युगों, सदियों, पलों-लम्हों की सुन्दरता तब होगी जब मानव जीवन सुन्दर होगा। जिन भावनाओं का ज़िक्र हो रहा है वो भावनाएं हृदय में घर कर जाती हैं तो जीवन सुन्दर बनजाता है यानि कि युगों-घडयि़ों-लम्हों की सुन्दरता मन की सुन्दरता के कारण है। मन की सुन्दरता ही हमें असल में इन्सानी रुप प्रदान करती है और दूषित भाव ही हैं जो हमें इन्सानी जामे में होते हुए भी शैतानियत के रास्ते पर चलाते हैं।

हैवानियत के रास्ते पर चलाने वाली भी यह हमारी अंधकारमयी सोच ही होती है जिसके कारण हम इस मानवीय शरीर को कलंकित करते हैं, मानव जाति को कलंकित करते हैं। यहां पर मन की सुन्दरता की बात हो रही है जिसके कारण इन्सानी वजूद में होकर भी हम देवता का रुप बन जाते हैं और देवता का रुप ही नहीं हम परमात्मा का रुप बन जाते हैं। सदैव से गुरु-पीर-पैगम्बरों ने जो यह ढंग बताया है आत्म-रुप होने का, परम अस्तित्व का रुप बनने का यही एक मात्र ढंग है। भाषाएं, पहरावे, संस्कृतियां ये हमारे बाहरी लिबास हैं। हमारी शक्लें-सूरतें हमारी मूल नहीं हैं, संस्कृतियां और बाकी सारी चीजें बाद में जुड़ी हैं। जो मूल है, जो प्राथमिक है, वह वास्तविकता में हमारा एक असल रुप, एक मानव वाला रुप है जिसमें आत्मा बसती है।

आत्मा जो परमात्मा की अंश है, जो दिव्यता है। इस दिव्य परमात्मा-ईश्वर-निराकार की अंश आत्मा ही हर घट में बसती है। हर घट में उसको मुख्य रखना, उसको मूल रुप से अपने जीवन में उजागर करने से ही वास्तविकता में हमारे जीवन का महत्व बनता है और हम एक सही इन्सान कहलाने के हकदार बनते हैं।

हम लोक और परलोक दोनों को संवारने वाले बन जाते हैं। इसीलिए सदैव से मूल के साथ जुडऩे की बात महापुरुषों-भक्तों ने की है। यह आत्मा कब से भटकी हुई है अपने मूल से और यह आवागमन के बन्धन में पड़ी हुई है इसकी अज्ञानता बरकरार रही है। अगर इसकी अज्ञानता बरकरार न रहती तो इसका आवागमन का बन्धन भी समाप्त हो गया होता। आत्मा का अज्ञान जब-जब भी समाप्त होता है, इस अंधकार के मिटने से होता है,ज्ञान का उजाला आने से होता है, अपने असली रुप में स्थित होने से होता है। आवागमन के ये बन्धन चलते रहे, उसका कारण यही रहा कि हमने बाहरी सिलसिलों को महत्ता दी।

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