UP Election 2027: दलित वोटों के 'नीले समंदर' में राजनीतिक गोता, आंबेडकर मूर्ति विकास योजना से भाजपा का मास्टरस्ट्रोक
A Political Dive into the 'Blue Ocean' of Dalit Votes
लखनऊ। वर्ष 2027 के विधान सभा चुनावों के लिए सज रही बिसात पर राजनीतिक दलों ने दलितों मतदाताओं का साथ पाने के लिए ‘बाजी’ लगा दी है। सबका ‘दांव’, ‘भीमराव’ (डा. बीआर आंबेडकर) पर है।
दलितों के एकमुश्त वोट की गांरटी के सहारे चार बार सत्ता की सीढ़ियां चढ़ चुकी बसपा, इन मतदाताओं को सहेजे रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। पिछले कुछ चुनावों से यह कैडर वोट थोड़ा छिटका है, ऐसे में भाजपा, सपा और कांग्रेस इस अवसर को भुनाने की कोशिश में लगी हैं।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव पहले से ही बहुजन समाज के महापुरुषों की जयंती आदि आयोजनों के सहारे इस नीले समंदर में अपनी चुनावी नैया उतार चुके हैं। अब ‘कमल’ भी इसी नीले रंग में रंगकर सत्ता की हैट-ट्रिक का रास्ता खोजने की तैयारी में है।
भाजपा पहले भी इस वोटबैंक में हिस्सेदारी पा चुकी है और अब योगी सरकार डा. बीआर आंबेडकर मूर्ति विकास योजना के सहारे अपने चुनावी समीकरणों में नीले रंग को और गहरा करने की कोशिश करेगी। ऐसे में बसपा के लिए दोबारा उभरने की राह और कठिन होना तय है।
14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती
14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती इसी राजनीतिक घमासान की गवाह बनेगी। भाजपा, वर्ष 2017 और 2022 की तरह योजनाओं और प्रतीकों, दोनों का सहारा ले रही है। मंगलवार को योगी सरकार द्वारा स्वीकृत की गई ‘डा. बीआर आंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ इसी रणनीति का विस्तार है।
इसके तहत डा. आंबेडकर, संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि आदि महापुरुषों की मूर्तियों का सुंदरीकरण होगा। रणनीति, सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में 10-10 स्मारकों का विकास करने की है। यह काम वर्ष 2027 का चुनाव आने तक चलेंगे।
ऐसे में भाजपा को इसका व्यापक लाभ मिलने की उम्मीद है। इससे पहले आंबेडकर जयंती पर सभी विधान सभा क्षेत्रों में कार्यक्रम आयोजित कर सांसद, विधायक, एमएलसी आदि जनप्रतिनिधियों द्वारा सरकार की योजना और उन चयनित स्थलों की जानकारी दी जाएगी, जिनको सरकार जन उपयोगी केंद्र के रूप में भी विकसित करने जा रही है।
वहीं वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने वाली सपा अपनी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की रणनीति के सहारे दलितों में बड़ी हिस्सेदारी का सपना बुन रही है। सपा की ओर से डा. आंबेडकर, कांशीराम सहित अन्य महापुरुषों से जुड़े दिवसों पर आयोजन किए जा रहे हैं।
पिछली आंबेडकर जयंती पर सपा प्रमुख ने ‘नीला गमछा’ डालकर दलितों को संदेश देने की कोशिश की थी। कांशीराम जयंती पर सभी जिलों में कार्यक्रम हुए। अब जयंती पर सपा सेक्टर और गांव स्तर पर आयोजन करने जा रही है। इनमें संविधान को लेकर चर्चा की जाएगी।
सपा की कोशिश दलितों तक व्यापक पहुंच के साथ वर्ष 2024 में जीत दिलाने वाले संविधान के खतरे में होने के नैरेटिव को जिंदा रखने की है। वहीं कांग्रेस गांव और मुहल्ला स्तर पर आरक्षण और संविधान बचाने के लिए दलित संवाद कर रही है।
पार्टियां राजनीतिक बिसात बिछाने में जुटीं
इन दलों की रणनीति से सबसे ज्यादा बेचैनी बसपा को है, क्योंकि 21 प्रतिशत दलित आबादी का लगभग 300 विधान सभा सीटों पर प्रभाव माना जाता है।
पिछले विधान सभा चुनाव में सिर्फ एक सीट पर सिमट चुकी बसपा अबकी वर्ष 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को दोहराना चाहती है लेकिन इसके लिए दलित वोटों पर पहले जैसी पकड़ जरूरी है। ऐसे में आंबेडकर जयंती पर लखनऊ के आंबेडकर स्मारक पर शक्ति प्रदर्शन करने की तैयारी है।
राजनीति दलों की रणनीति चाहे जो हों, परंतु चुनौती भी सबके लिए है। फिलहाल, प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक को लेकर भाजपा और सपा के बीच सीधी टक्कर होती जरूर दिख रही है।