धधकते जंगल: ऊना के वनों पर बढ़ती गर्मी और मानवीय लापरवाही का साया
The Shadow of Rising Heat and Human
चिंतपूर्णी (ऊना)। हिमाचल प्रदेश में वन्य क्षेत्र का घटता दायरा बेशक पर्यावरणविदों के लिए चिंतन व मनन का विषय हो सकता है, लेकिन सच यही है कि जब तक सामूहिक रूप से प्रयास नहीं किए जाते हैं, तब तक वन संपदा को बचा पाना मुश्किल लगता है।
अब जबकि गर्मी में बढ़ोतरी दर्ज होने लगी है और तापमान 34 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच चुका है, ऐसे में वन संपदा को सबसे अधिक खतरा आने वाले दिनों में आग से ही होगा। जब वन विभाग के पास स्टाफ की कमी है, पौधारोपण व कंट्रोल बर्निंग के लिए बजट की कमी है और जंगल में आग लगने के बाद लीपापोती के बहाने हैं, ऐसे में वनों को सुरक्षित रखना किसी चुनौती से कम नहीं रहने वाला है।
ऊना जिले के वन्य क्षेत्र में मार्च के दूसरे पखवाड़े में ही आग की कई घटनाएं प्रकाश में आती रही हैं। गर्मी के मौसम में आग कैसे और क्यों लगती है, इसके बारे में वन विभाग शायद जमीन स्तर पर अध्ययन नहीं कर पाया है। वैसे भी तथ्य व प्रमाण बताते हैं कि जंगल में आग लगने के पीछे 90 प्रतिशत से ज्यादा हाथ मानव का ही होता है।
बेशक जंगल को खुला खजाना कहा जाता है और इसकी सुरक्षा की जिम्मेवारी वन विभाग की होती है, लेकिन ग्रामीण भी फायदे के लिए जंगल को आग में झोंक देते हैं। घासनियों में लगी आग भी वन्य क्षेत्र तक पहुंचती है। सात वर्ष पूर्व चलाली स्थित धार्मिक संस्थान के सामने घासनियों में लगी आग ने लोहारा, गुरेट और अरहनवाल के जंगल को तबाह कर दिया था। महज घास के लिए ही लोग घासनियों में आग लगाते हैं और यह भूल जाते हैं कि आग से करोड़ों रुपये की संपदा नष्ट हो जाती है।
हैरानी की बात है कि आज तक आग लगाने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध वन विभाग पुख्ता प्रमाण जुटा पाने में असफल रहा है। ऐसे में जंगल की आग को रोकने के लिए न सिर्फ वन विभाग को अब सक्रियता से जिम्मेदारी निभानी होगी, वहीं ग्रामीणों को भी इस दिशा में जागरूक करने की जरूरत के साथ आग लगाने वाले लोगों के खिलाफ भी सार्वजनिक रूप से आगे आना होगा।
जंगल में आग लगने के कारण
- शहद एकत्रित करने के लिए जानबूझकर आग लगाना।
- वन्य क्षेत्र में जलती बीड़ी या सिगरेट फेंकना।
- पशुओं के लिए हरे घास के लिए गर्मी के दिनों में आग लगाना।
- दुर्भावना के लिए भी वन्य क्षेत्रों को आग के हवाले कर देना।
सुझाव व बचाव के उपाय
- चीड़ की पत्तियों को गर्मी के मौसम से पहले एकत्रित करने की योजना बनाई जा सकती है।
- गर्मी के मौसम से पहले फायर लाइंस को क्लीयर करना।
- फायर सीजन में वन्य क्षेत्र में पर्याप्त कर्मचारियों की तैनाती करना।
- आग लगने के बाद नियोजित तरीके से आग बुझाने के प्रबंध करना।
आग के मामले में विभाग एफआइआर तो दर्ज करवाता है, लेकिन साक्ष्यों के अभाव में ऐसे लोगों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं हो पाती है। गांववासी भी आग लगाने वाले को बचाने के लिए बयान नहीं देते हैं, जो गलत परंपरा है। यदि कोई गलत कार्य कर रहा है, तो हर नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि उसके विरुद्ध आपत्ति दर्ज करवाई जाए। - पूर्ण राम, रेंज अधिकारी, वन विभाग।