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आचार्य भिक्षु की अहिंसा सार्वभौमिक क्षमता पर आधारित थी : मुनिश्री विनय कुमार जी

आचार्य भिक्षु ने अपने मौलिक चिंतन के आधार पर नये मूल्यों की स्थापना की। हिंसा व दान-दया संबंधी उनकी व्याख्या सर्वथा वैज्ञानिक कही जा सकती है। आचार्य भिक्षु की अहिंसा सार्वभौमिक क्षमता पर आधारित थी। बड़ों के लिए छोटों की हिंसा और पंचेन्द्रिय जीवों की सुरक्षा के लिए एकेन्द्रिय प्राणीयों का हनन आचार्य भिक्षु की दृष्टि में आगम समस्त नहीं था। अध्यात्म व व्यवहार की भूमिका भी उनकी भिन्न थी।

उन्होंने कभी ओर किसी भी प्रसंग पर दोनों को एक तुला से तोलने का प्रयत्न नहीं किया। उनके अभिमत से व्यवहार व अध्यात्म को सर्वत्र एक कर देना घी ओर तम्बाकू के सम्मिश्रण जैसा अनुपादय है। दान दया के विषय में लैकिक एवं लौकतर भेद रेखा प्रस्तुत कर आचार्य भिक्षु ने जैन समाज में प्रचलित मान्यता के समक्ष नया चिंतन प्रस्तुत किया। उस समय समाजिक समानता का माप दंड दान दया पर अवलंबित था। सर्वर्गोपलब्धि और पुण्योपलब्धि की मान्यताएं भी दान दया के साथ जुड़ी हुई थी। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने त्रिदिवसीय कार्यक्रम के अंतर्गत आचार्यश्री भिक्षु 294वां जन्म दिवस एवं 262वां बोधि दिवस अणुव्रत भवन सैक्टर-24 तुलसी सभागार में कहे।

मनीषी श्रीसंत ने कहा अनुशासन राष्ट्र का जीवन-रक्त है। सच पूछा जाए तो अनुशासन ही मानव सभ्यता के विकास की पहली सीढ़ी है, जिसके सहारे हमारा क्रमिक विकास संभव हुआ है। प्रकृति के समस्त कार्य-व्यापार किसी न किसी नियम से बंधे होते हैं। पृथ्वी नित्य नियम से अपनी धुरी पर घूमती है, जाड़ा, गरमी और बरसात सदैव समय पर आया करते हैं। अनुशासन दो शब्दों से मिलकर बना है- अनु और शासन। अनु उपसर्ग है जो शासन से जुड़ा है और जिससे अनुशासन शब्द निर्मित हुआ है। जिसका अर्थ है- किसी नियम के अधीन रहना या नियमों के शासन में रहना। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन आवश्यक है।

पारिवारिक और सामाजिक जीवन में तो कहीं ज्यादा अनुशासन की आवश्यकता होती है। यदि अनुशासन का पालन नहीं किया जाए, तो जीवन उच्छृंखल बन जाएगा। हम इतिहास व पुराण उठाकर देखें, तो हमें इसके अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जहां अनुशासन से महत्वपूर्ण सफलताएं और उपलब्धियां हासिल हुई हैं। ये उपलब्धियां हमारे लिए प्रेरणा का प्रबल स्तंभ बनीं। आज जीवन की आपाधापी बढ़ गई है, लोग कम समय में अधिक से अधिक सफलताएं प्राप्त कर लेना चाहते हैं।

वह येन-केन-प्रकारेण ढंग से लक्ष्य प्राप्ति के लिए दौड़ते रहते हैं। वे अनुशासन का पालन करना जरूरी नहीं समझते, लेकिन इसके विपरीत सच्चाई यह है कि जहां जितना अच्छा अनुशासन है, वहां उतनी ही शांति व सुख है। यह एक कटु सच्चाई है कि अनुशासन के बिना सफलता नहीं हासिल की जा सकती। जिस देश के लोग अनुशासित हैं, जहां की सेना अनुशासित है, वह देश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता रहेगा, वह सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ता रहेगा। अनुशासन का पहला पाठ हम घर से सीखते हैं। घर ही वह प्रथम पाठशाला है, जहां हमें भली-भांति अनुशासन की शिक्षा मिलती है। यह शिक्षा केवल पुस्तक के पन्नों को उलटने से नहीं मिलती, बल्कि वयस्कों के या स्वयं के अनुशासन से बच्चों को मिलती है। बड़ों के आचरण का प्रभाव छोटों पर पड़ता है,

अनुशासन के पक्ष में सर्तकता का होना जरूरी

मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया आचार्य भिक्षु ने कहा था कि अनुशासन के पक्ष में सर्तकता का होना जरूरी है ऐसी सर्तकता, जो कठोरता और कोमलता दोनों से परे हो। कठोरता के पीछे कष्ट देने की नीति होती है। जबकि स्वंतत्रता के पीछे केवल व्यवस्था को बनाए रखने की नीति क्रियाशीलता होती है। विशिष्ट महापुरूषों को समय समय पर विशिष्ट ज्ञान की प्राप्ति होती है, भगवान महावीर को केवल ज्ञान की, बुद्ध को बोधि प्राप्त हुई उसी श्रंृखला में आचार्य भिक्षु के अंतर नेनों का खुलना नई चेतना का उदर्वारोहण सोई सुस्त चेतना का जागरण ही बोधि है।आचार्य भिक्षु ने लौकिक दान दया की व्यवस्था को कर्तव्य व सहयोग बता कर मौलिक सत्य का उद्घाटन किया। साध्य साधन के विषय में भी उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था। उनके अभिमत से शुद्ध साध्य के द्वारा ही सुध साधय की प्राप्ति सम्भव है।
उन्होंने कहा रक्त से सना वस्त्र कभी रक्त से शुद्ध नहीं होता। वैसे ही हिंसा प्रधान प्रवृति कभी अध्यात्म के पावन लक्ष्य तक नहीं पहुचा सकती। सुव्यवस्थाओं के लिए अनुशासन सदैव आवश्यक होता है। ऐसी स्थिति में वैयक्तितक स्वंतत्रता और समाजवाद के बीच समन्वय स्थापित करना जरूरी होता है। तेरापंथ धर्मसंघ इसी प्रयोग भूमि पर अधारित है। और नित नए सोपान सर्जित कर रहा है।

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