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So people didn't die from lack of oxygen?

तो ऑक्सीजन की कमी से नहीं मरे लोग?

So people didn’t die from lack of oxygen? देश की संसद में सरकार की ओर से कहा गया है कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई है। कोरोना से हुई मौतों के लिए मुआवजा देने के सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश का विरोध कर चुकी केंद्र सरकार की ओर से अब ऑक्सीजन की कमी से मौत न होने का बयान विवाद को जन्म दे चुका है। अप्रैल के मध्य और मई में देशभर के अस्पतालों में जैसी अफरा-तफरी थी, ऑक्सीजन की कमी से एक साथ अस्पतालों में दर्जनों मौैतें हो रही थीं।

सरकारी और निजी अस्पताल संचालक सरकार से ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की गुहार लगा रहे थे, ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही थी। ऐसे समय में जनता की जान पर जब भारी संकट आया हुआ था, वह लाखों जानें लेकर गुजर गया और अब केंद्र सरकार कह रही है कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। अगर सबकुछ इतना सामान्य ही था तो फिर ऐसी अफरा-तफरी क्यों थी। आखिर इस बयान का सच क्या है। क्या सच में ऑक्सीजन की कमी से मौतें नहीं हुई। संभव है, सच छुपाया जा रहा है, और इसे छिपाने वाली हैं राज्य सरकारें।

So people didn’t die from lack of oxygen? स्वास्थ्य राज्य का विषय है, राज्यों के अस्पतालों में कोरोना मरीजों को संभालने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की ही थी, उसे संभालने में ज्यादातर सरकारें विफल रही हैं। उस समय दिल्ली सरकार केंद्र से गुहार लगा-लगाकर ऑक्सीजन मांग रही थी। खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री से इसकी मांग कर रहे थे। लेकिन अब राज्य सरकार दावा कर रही है कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। इसी प्रकार अन्य राज्य सरकारों ने भी किया है। यही आंकड़े केंद्र सरकार को मुहैया कराए गए हैं, जिनमें बताया गया है कि कोरोना से मौतें हुई हैं, लेकिन ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई। अगर राज्य सरकारें यह स्वीकार कर लेती हैं कि ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं तो इसका अभिप्राय यह होगा कि वे स्वीकार कर रही हैं कि हां, उनके सिस्टम में कोताही रही है। यह भी कि वे कोरोना के मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने में विफल रही हैं। यह बात चुनाव के समय में सत्ताधारी राजनीतिक दलों के खिलाफ इस्तेमाल होगी। जिसका प्रबंध वे अभी से कर रही हैं कि यह स्वीकार ही मत करो कि उनके यहां ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं। जाहिर है, इस सच को स्वीकार करने में भाजपा और दूसरे दलों की सरकारें भी शामिल हैं। यह तब है, जब केंद्र सरकार ने माना है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की डिमांड काफी बढ़ गई थी।

देश के सम्मुख राज्य सरकारों का यह सच तब उजागर हुआ है, जब कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने सरकार से पूछा था कि क्या यह सच है कि दूसरी लहर में कई सारे कोरोना मरीज सड़क पर और अस्पताल में इसलिए मर गए क्योंकि ऑक्सीजन की किल्लत थी? इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री भारती प्रवीण पवार ने लिखित उत्तर में बताया कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है। सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को कोरोना के दौरान हुई मौतों के बारे में सूचित करने के लिए गाइडलाइंस दिये गये थे। किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया है कि किसी की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई है।

आखिर केंद्र सरकार पर कोरोना से निपटने में कोताही का आरोप लगाने वाली कांग्रेस और उसके नेताओं को इसका जवाब नहीं देना चाहिए कि आखिर उनके द्वारा शासित राज्य सरकारों ने उन मौतों के आंकड़े क्यों नहीं दिए, जिनमें ऑक्सीजन की कमी से संक्रमितों की मौत हुई। वैसे, क्या राज्य सरकारों की ओर से पेश रिपोर्ट वास्तव में सच पर आधारित है। जिन लोगों की मौत निजी अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से हुई है, क्या उनका राज्य सरकार ने कोई रिकॉर्ड रखा है, या फिर अपने सरकारी अस्पतालों का ब्योरा ही केंद्र सरकार को पकड़ा दिया। अगर निजी अस्पतालों में ही ऑक्सीजन की कमी थी तो फिर देश में ऑक्सीजन की खपत इतनी कैसे बढ़ गई, क्योंकि मरीजों की संख्या सरकारों के द्वारा संचालित अस्पतालों में ही ज्यादा थी। केंद्र का कहना है कि महामारी की पहली लहर के दौरान जीवन रक्षक गैस की मांग 3095 मीट्रिक टन थी जो दूसरी लहर के दौरान बढ़ कर करीब 9000 मीट्रिक टन हो गई।

विपक्ष ने केंद्र सरकार के इस बयान पर ऐतराज जताया है, बाकी राजनीतिक दलों ने भी इसे लेकर केंद्र पर चढ़ाई का मन बनाया है। ऐसे में भाजपा ने बचाव में कदम उठाते हुए राज्य सरकारों पर ही वास्तविकता छिपाने का आरोप लगा दिया है। तर्क के आधार पर इस बात को समझना होगा कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है और राज्यों में कोरोना मरीजों को इलाज की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, राज्य के अस्पतालों में जो घटा है, उसकी जानकारी राज्य सरकार के पास होनी ही चाहिए। अगर ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं तो फिर एक राज्य सरकार के पास इसकी जानकारी क्यों नहीं है। और अगर उसका दावा है कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई है तो फिर उसके इस दावे पर कितना भरोसा किया जाना चाहिए।

जाहिर है, राज्य में सत्ताधारी राजनीतिक दल अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए इससे इनकार कर रहा है। केंद्र का तर्क है कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश नियमित रूप से केंद्र सरकार को कोविड के मामले और इसकी वजह से हुई मौत की संख्या के बारे में सूचना देते हैं। बहरहाल, किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने ऑक्सीजन के अभाव में किसी की भी जान जाने की खबर नहीं दी है। वैसे, राज्य सरकारों की ओर से तो कोरोना से मौत की बात भी छिपाई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से परिजनों को मुआवजा देने संबंधी निर्देश के बाद सरकारों की ओर से मौतों के आंकड़े जुटाए जा रहे हैं। हो सकता है, अगर अदालत का इसमें दखल न होता तो सरकार इससे भी इनकार कर देती कि कोरोना से कोई मौत हुई है।

लोकतंत्र में सरकार का दायित्व लोक कल्याणकारी होना होता है, लेकिन अब सत्ताधारी राजनीतिक दल के लिए सरकार खुद को हमेशा सत्ता में बनाए रखने का जरिया हो गया है। यही वजह है कि वह देश को चलाने का दावा करता है, लेकिन कोरोना जैसी महामारी के वक्त अपने हाथ झाड़ कर खड़ा हो जाता है। लगता है, जनता को अपने लिए सुविधा और सहूलियत मांगने का अधिकार नहीं है, वह अस्पतालों में बगैर दवा, बगैर बिस्तर, बगैर ऑक्सीजन मरती रहे, लेकिन राज्य और केंद्र की सरकारें अपने रिकॉर्ड में इसका जिक्र कभी नहीं रखेंगी ताकि उनका भविष्य बेदाग रहे और इतिहास में कभी उन पर सवाल न उठने पाएं।

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