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बंगाल में सच में हो गया खेला

बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम भाजपा के लिए अप्रत्याशित हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के लिए भी इन्हें सुनिश्चित नहीं माना जाना चाहिए। लोकसभा चुनाव में 121 से ज्यादा सीटों पर अपना असर दिखाने वाली भाजपा अगर विधानसभा चुनाव में 76 सीटों पर ही कामयाबी हासिल कर सकी तो इसका अभिप्राय यह है कि बंगाल की जनता को मोदी नहीं अपितु ममता दीदी ज्यादा रास आई।

लोकतंत्र में जनता का मत सर्वोपरि है, उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, लेकिन आखिर राष्ट्रीय मुद्दों के ऊपर जनता ने अगर राज्य स्तरीय मामलों को तरजीह दी है, तो यह भी विश्लेषण का विषय है। बंगाल के मुकाबले भारत जैसा रहा यह चुनाव अब जब तृणमूल कांग्रेस ने जीत लिया है तो ममता बनर्जी यह कहने से नहीं चूक  रही कि बंगाल ने आज भारत को बचा लिया। आखिर इस बयान का क्या अर्थ है? बंगाल में भाजपा जीत जाती तो क्या बंगाल किसी बाहरी ताकत के हाथ में चला जाता। क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि बंगाल की जनता ने भावुकता में फैसला लिया है। राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार का यह तीसरा  कार्यकाल होगा। इससे पहले दो कार्यकाल में पार्टी ने राज्य में जो भी काम किया है, वह मतदाता के सामने था।

आज भी राज्य में तमाम समस्याएं हैं, लेकिन माटी और मानुष की ऐसी गूंज सुनाई दी, जिसने मतदाता को किसी अन्य की आवाज सुनने ही नहीं दी। यह भी आश्चर्य की बात है कि मतदाता ने किसी परिवर्तन की चाह नहीं रखी, उसने उसी राजनीतिक दल को फिर से सत्ता सौंप दी, जोकि राज्य में अपराध को बढ़ाने, केंद्र के साथ बेवजह का संघर्ष करने और राज्य के निवासियों के कल्याण से उपेक्षित रहने का उपाय झेल रही है। चुनाव जीतने के बाद यह तृणमूल कांग्रेस के अहंकार का साकार रूप ही था कि उसके कार्यकर्ताओं ने भाजपा के कार्यालय में आग लगा दी। आखिर वह कौन है, जिसने भाजपा को बाहरी बताया था और अपने कार्यकर्ताओं को उसके खिलाफ हिंसक होने को कहा था। ये ममता बनर्जी ही थीं, अब वही ममता बनर्जी इसे बंगाल के लोगों की जीत बता रही हैं।

बंगाल का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए उम्मीदों की राह था। बंगाल के पड़ोसी बिहार में शानदार एवं अप्रत्याशित जीत हासिल करने वाली भाजपा को लग रहा था कि वह बंगाल में इस बार कमल खिला देगी। यही वजह रही कि केंद्र सरकार के दर्जन भर मंत्री एवं नेता जहां बंगाल में विजयी अभियान में जुटे थे वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा खुद राज्य में भर-भर कर रैलियां कर रहे थे। इस दौरान भाजपा अपनी जीत से इस प्रकार आशान्वित थी कि उसे इसका अहसास तक नहीं था कि बंगाल की जनता के दिलोदिमाग में कुछ और भी चल रहा है। भाजपा ने राज्य में भीड़ तो जुटाई लेकिन उस भीड़ से वोट नहीं ले पाई। बंगाल में प्रचार के दौरान अक्सर यह सुनने को मिलता था कि एक महिला को घेरने के लिए प्रधानमंत्री समेत पूरी भाजपा ने जान लगा दी है। तब यह माना जाए कि बंगाल की जनता ने इसे अपने सम्मान का प्रश्न बना लिया कि ममता दीदी ने राज्य में कुछ किया है या नहीं, यह बाद में देखेंगे, पहले भाजपा को यह बताएंगे कि उसने दीदी पर हमलावर होकर गलत किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में जितनी भी रैलियां की, उनमें उन्होंने ममता बनर्जी पर दीदी…औ दीदी… के संबोधन के साथ जबरदस्त हमला किया था। इस दौरान उन्होंने ममता सरकार में भ्रष्टाचार, अव्यवस्था आदि को लेकर जमकर आलोचना की थी। हालांकि इसी दौरान ममता बनर्जी को पैर में चोट लगी और फिर जैसे उन्हें एक चाबी हाथ लग गई। उन्होंने व्हील चेयर से ही भाजपा पर पलटवार किया और लगातार रैलियां करती रहीं। हालांकि जीत का समाचार आते ही वे व्हील चेयर से उठ खड़ी हुईं। जाहिर है मिशन सहानुभूति पूरा हो चुका है।

इस चुनाव को पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस मुकाबले भाजपा ही देखा जाना चाहिए। कहा जा रहा है कि कांग्रेस और वाम दलों ने इस चुनाव में दिलचस्पी ही नहीं ली। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तो राज्य में प्रचार के लिए ही नहीं गए और आखिरी समय में उन्होंने रैलियां न करने का ऐलान भी कर दिया। ऐसे में एक राष्ट्रीय दल के कांग्रेस के दावे पर संदेह होता है। बिहार चुनाव में मात खाने वाली कांग्रेस को बंगाल के चुनाव में शून्य सीट की प्राप्ति हुई है। क्या इसके बावजूद वह इसका हक रखती है कि खुद को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पेश कर सके। कांग्रेस ने अपनी राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं के तुष्टिकरण का हमेशा प्रयास किया है, हालांकि बंगाल के चुनाव में मुस्लिम मतदाता ने कांग्रेस को बाय कह दिया और ममता बनर्जी के समर्थन में मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो गया। हालांकि राज्य का शहरी मतदाता भी भाजपा के साथ नहीं चला, कोलकाता में पार्टी को एक भी सीट हासिल नहीं हुई। हालांकि रोड शो के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भीड़ को दिखाते हुए दावा करते थे कि यह सैलाब भाजपा के साथ है।

दरअसल, ममता बनर्जी को इसकी भरपूर आशंका थी कि इस बार राज्य में भाजपा भारी पड़ सकती है, नंदीग्राम में भाजपा उम्मीदवार जोकि एक समय उनका ही सिपहसालार था से हार चुकीं दीदी अपनी सीटों की अदला-बदली ही करती रहीं। इससे यही संदेश गया था कि वे खुद को घिर हुआ मान चुकी हैं। बाद में जो कुछ भी देखने को मिला, वह एक सरकार के कामकाज का आकलन नहीं, अपितु निजी मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, बंगाल की बेटी और बाहरी के दांव को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना था। इस चुनाव में बंगाली अस्मिता जहां मतदाताओं के सिर चढक़र बोलीं वहीं भाजपा की ओर से उम्मीदवारों के चयन में उठापटक, मुख्यमंत्री पद का कोई जनता के अनुकूल चेहरा न होना और आक्रामक होकर तृणमूल कांग्रेस से सत्ता छीनने जैसे प्रयासों ने भी उसे कामयाबी से पीछे किया। ममता बनर्जी की जीत राष्ट्रीय राजनीति में भी नए समीकरण लाएगी। लगातार तीन बार शानदार जीत हासिल करने वाली दीदी में देश को अब राष्ट्रीय नेतृत्व भी नजर आ सकता है।

हालांकि विपक्ष उन्हें अपने नेता के रूप में स्वीकार करेगा, इसमें खूब संशय है। बीते वर्षों में कर्नाटक में भाजपा के खिलाफ एकजुट होने विपक्ष ने ममता दीदी को महत्व नहीं दिया था। बहरहाल, राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष ममता बनर्जी का एक सशक्त राजनीतिक हस्ताक्षर के रूप में अवतरण हो चुका है। लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वमान्य होता है। आशा है तृणमूल कांग्रेस राज्य में अपने एक और शासनकाल के दौरान विकास की नई इबारत लिखेगी। ममता बनर्जी को राज्य के लोगों से किए वादों को पूरा करना होगा। उन्होंने इस खेला को जीत लिया है।

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