Living in pollution is a violation of the fundamental right to life.
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Editorial:प्रदूषण में रहना है जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन

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Living in pollution is a violation of the fundamental right to life.

Living in pollution is a violation of the fundamental right to life. सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अपने आप में सब कुछ कह देती है कि प्रदूषण में रहना जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। देश की सर्वोच्च अदालत पर्यावरण को लेकर जो फैसले देती है, वे नजीर होते हैं। लेकिन अदालत अपना काम पूरा कर देती है, उसके बाद उस फैसले को लागू करना सरकारों का दायित्व होता है। क्या वास्तव में ही सरकारें इसकी परवाह करती हैं कि प्रदूषण में रहना जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। देश में पर्यावरण को साफ बनाए रखने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन क्या वे काफी हैं। असल में दिल्ली और उसके आसपास के इलाके में प्रतिदिन 3800 टन कचरे के अशोधित रह जाने को माननीय अदालत ने भयानक स्थिति करार दिया है।

वास्तव में हकीकत यह है कि ऐसी स्थिति के लिए अब शब्द भी कम पड़ रहे हैं, क्योंकि दिल्ली जोकि देश की राजधानी है, वहां प्रतिदिन जो कचरा निकलता है, उसे ले जाकर जहां डंप किया जाता है, वह एक कूड़े का पहाड़ बन चुका है और आजकल क्या अगले कई बरस तक उस जगह को साफ नहीं किया जा सकता। यह स्थिति तब है, जब देश में आम चुनाव जारी है और कोई भी राजनीतिक दल कचरे के पुख्ता समाधान के बारे में अपना पक्ष नहीं रख रहा। सभी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में लगे हैं, क्या अच्छे स्वास्थ्य के बगैर यह सब खानापूर्ति नहीं होगा।

वास्तव में इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा कि हमारी हवा स्वच्छ हो और हम अपनी अगली पीढ़ी को एक स्वस्थ जीवन का उपहार सौंप सकें। जैसे हालात नजर आते हैं, उनमें प्रति वर्ष न केवल हमारा पर्यावरण अपितु हवा की शुद्धता कम हो रही है। यह तब है, जब सर्वोच्च न्यायालय तक राज्य सरकारों को अपने यहां वायु प्रदूषण के कारकों की रोकथाम के लिए कह चुका है। गौरतलब है कि प्रत्येक वर्ष मार्च के महीने में पराली की वजह से दिल्ली एनसीआर में जीवन त्रस्त हो जाता है। इस पर भी सुप्रीम कोर्ट की ओर से राज्य सरकारों से जवाब मांगा जाता है, लेकिन पंजाब एवं हरियाणा की सरकारें इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराती हैं। सर्वोच्च अदालत पंजाब एवं हरियाणा की सरकारों को कुछ भी करके पराली जलाने पर रोक लगाने को कह चुका है। हालांकि इसके बावजूद ऐसी रिपोर्ट आती रहती हैं कि पराली को आग लगाना जारी है। पंजाब में पराली जलने के मामलों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने पंजाब के मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगी थी।

दरअसल, यह कहना उचित है कि प्रदूषण के लिए सिर्फ पराली का जलना ही जिम्मेदार नहीं है। यह भी सच है कि मानसून के बाद खनन कार्य में तेजी आई है, वहीं निर्माण के सेक्टर में भी तेजी देखने को मिलती है।  इससे हवा में धूल के कणों की संख्या बढ़ जाती है, साथ ही हवा की गति इन दिनों धीमी हो जाती है। इससे आसमान में धूल, धुएं के गुब्बार बन जाते हैं, जोकि समस्या की मुख्य वजह हैं। अब सुप्रीम कोर्ट जिस बात को रेखांकित कर रहे हैं, उस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है। एक प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना मौलिक अधिकार है तो फिर यह अधिकार क्यों प्रदान करवाया जाता। इसकी जिम्मेदारी किसकी है। आजकल न हवा शुद्ध है, न पानी, न जमीन के ऊपर स्वच्छता है और न ही उसके अंदर। हर तरफ प्रदूषण है, पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। नदियों में रोजाना हजारों टन कचरा रोजाना बहाया जा रहा है। गंगा नदी के शुद्धिकरण की मुहिम कितने बरसों से जारी है, इस पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। लेकिन अब तब इस नदी का पानी हरिद्वार से आगे आचमन के लायक भी नहीं है। बेशक, गंगा जी परम पवित्र हैं, लेकिन आस्था के नाम पर अगर उस दूषित पानी का सेवन किया जाएगा तो क्या यह बीमारी को न्योता नहीं होगा।

चंडीगढ़ की बात करें तो यहां भी प्रदूषण बड़े पैमाने पर हो रहा है, शहर में मेट्रो चलाने का प्रोजेक्ट फाइलों तक सीमित है। प्रशासन की ओर से यहां इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है, लेकिन प्रशासन इसके लिए मूलभूत संसाधन ही विकसित नहीं कर पा रहा है। चंडीगढ़ में रोजाना हजारों की तादाद में वाहन आते-जाते हैं। यह भी प्रदूषण को बढ़ाने में अहम भूमिका अदा कर रहा है, लेकिन इसका कोई उपाय नहीं है। यह जरूरी है कि प्रदूषण रोकने की कवायद फाइलों से बाहर आकर जन अभियान बनाई जाए। आखिर प्रदूषण के रोकथाम की बात सिर्फ चर्चा में ही क्यों होती है, हकीकत में इसकी रोकथाम का समाधान कब और कैसे होगा?

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