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भक्त जन इस सत्य के साथ ही नाता जोड़ते हैं: निरंकारी बाबा

आज समाज में फैली कुरीतियों को आप देख रहे हैं कि किस प्रकार ये समाज की जड़ों को खोखला कर रही है। किस तरह स्वर्ग जैसे घर नर्क बन रहे हैं। किस कद्र नशे बढ़ रह हैं जिससे समाज में अनेकों मानव पीडि़त हैं। जहां समाज में ये कुरीतियां हें, वहां कई तरह की दीवारें भी है जो मजहबो-मिल्लत ने खड़ी कर रखी है। जाति-पांति की दीवारें हैं, भाषाओं, प्रान्तों की दीवारें हैं। इन दीवारों में इन्सान का वास्तविक रुप, असल रुप खो गया है। महापुरुष यही सन्देश दे रहे हैं कि हमने इन सभी दीवारों को गिराना है। सत्युग हो, द्वापर हो, त्रेता हो या कलयुग हो, सन्तजन यह कार्य करते ही चले आये हैं।

यहां आपने सन्त ज्ञानेश्वर जी का रुप देखा, सन्त तुकाराम जी का रुप भी देखा। आन्ध्र के सन्त वेतन्ना जी व वेमन्ना जी का रुप भी देखा और ईसा मसीह का रुप भी देखा जिन्होंने इस सच्चाई की आवाज़ को फैलाते हुए, एक दूसरे से प्रेम करने की शिक्षा देते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया। इसी प्रकार बाबा बूआ सिंह जी, बाबा वतार सिंह जी, बाबा गुरबचन सिंह जी का रुप भी आपने देखा।

उन्होंने भी सच्चाई को ही इस संसार में प्रकट करने के लिए जी-जान की बाजी लगाई। संसार के लोगों के ताने-मेहने (कड़वे बोल) सहे। नाना प्रकार की रुकावटों में से गुजरते गये और यहां तक कि अपने शरीर की आहूति दे डाली। इनके साथ-साथ और भी अनेकों बलिदानी महापुरुषों ने इस सत्य को उजागर करने के लिए, भाईचारा स्थापित करने के लिए, सभी प्रकार के भेदों को मिटाकर मानव-मानव बनकर जिये, इस कारण बड़े-बड़े बलिदान दिये।

इन्हीं महापुरुषों के कारण यह सत्य की आवाज़, यह मधुर संगीत, वातावरण को सुगन्धित करता चला आया है। जैसे अंग्रेजी में कहते हैं कि हर बूंद का संगीत वातावरण को मधूर बनाता है जिससे सभी सकून व चैन प्राप्त करते हैं। वह जो संगीत पैदा होता हे, वास्तव में सत्य पर आधारित होने के कारण होता है। भक्तजन इस सत्य के साथ ही नाता जोड़ते हैं, भले ही वह भक्त प्रह्लाद का रुप हो, मीरा का रुप हो, गुरमीखी भाषा बोलने वाले का, उडयि़ा, बंगाली या मराठी भाषा बोलने वाले सन्त का रुप हो। वे सब ऐसा शान्तमय संगीत ही पैदा करते हैं जिससे हाहाकार के शोर से राहत प्राप्त होती है। यह हाहाकार का शोर आज गलियों, शहरों और मुल्कों में सुनने को मिल रहा है। यह शोर कहीं गालियों का है, कहीं अपशब्दों का है, कहीं हमारे कर्मों का शोर है।

भाव, नाना प्रकार के शोर हमारे कानों में पहुँचते हैं; हमें बेचैनी प्रदान करते हैं। ऐसे घोर शोर में थोड़ी सी मधूर तरंगे, संगीत की, सुन जाने से कितनी राहत प्राप्त होती है। कड़कती हुई धूप में चलते हुए हम बहुत परेशान हो जाते हैं। ऐसे में कहीं पेड़ की छाया मिल जाती है या कोई बदली छा जाती है या बौछार बहने लगती है तो हम कितनी राहत महसूस करते हैं।

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