सरहद के प्रहरी: 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद हीरानगर में बदला माहौल; बंकर बने ढाल, पर चुनौतियां अब भी बरकरार

सरहद के प्रहरी: 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद हीरानगर में बदला माहौल; बंकर बने ढाल, पर चुनौतियां अब भी बरकरार

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Border Guard: The atmosphere in Hiranagar has changed

हीरानगर (कठुआ)। घरों की दीवारों पर गोलियों के निशान यह बताने के लिए काफी हैं कि सीमा से सटे गांवों के निवासी दिल में कई जख्म पाले हैं। एक दौर था कभी फायरिंग, कभी तोप के गोले, उनके जीवन का हिस्सा बन चुके थे। पाकिस्तान से हर बार तनाव के बावजूद ग्रामीण सीमाओं के प्रहरियों के साथ ही डटे रहे और कई बार सेना के लिए रसद और अन्य साजोसामान पहुंचाने में कंधे से कंधा जोड़कर डटे रहे।

आपरेशन सिंदूर में भी स्थिति जुदा नहीं थी, हालांकि हीरानगर क्षेत्र में इस बार गांवों में गोले नहीं बरसे पर तनाव के बीच एक पखवाड़े तक उनकी रातें बंकरों में ही कटी। आसमान में ड्रोन की जंग को पहली बार लोगों ने करीब से महसूस किया। पूर्व में तनाव शुरू होते ही ग्रामीणों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ता था। इससे लोगों को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से गहरी चोट पहुंचती थी।

लोगों का कहना है कि हालात पहले से बेहतर अवश्य हुए हैं, लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं। केंद्र सरकार द्वारा बंकरों के निर्माण से लोगों को राहत मिली है। तारबंदी से सटे गांवों के लोग बताते हैं कि आपरेशन सिंदूर के बाद एक बात बेहतर हुई कि सीमापार से हो रही गतिविधियों पर लगाम दिखी, कठुआ जिले में घुसपैठ और संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर लगाम लगी है।

दुश्मन पर नहीं किया जा सकता भरोसा 

ग्रामीण केंद्र सरकार के रुख को इसका कारण मानते हैं और आपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के आधारभूत ढांचे को बहुत चोट लगी और शायद यही कारण है कि वह फिर से हिमाकत नहीं करना चाहता। हालांकि सीमापार आतंकियों के लांचिंग पैड फिर से सक्रिय हो गए हैं। ग्रामीणों के अनुसार अब भले ही गोलीबारी थमी है, लेकिन बीते दशकों की गोलियों के निशान अब भी लोगों की ज़िंदगी और यादों में ताजा हैं। दुश्मन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

पिछले कुछ वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछा है, जिससे आवाजाही आसान हुई है। स्थानीय लोग भी सीमा सुरक्षा बल और सेना के साथ बेहतर तालमेल बनाकर सहयोग कर रहे हैं। कुल मिलाकर सीमांत गांवों की यह कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि साहस, धैर्य और उम्मीद की भी है। यह लोग तमाम चुनौतियों के बावजूद अपने वतन की सरहद की हिफाजत में एक मजबूत कड़ी बने हुए हैं।

सीमावर्ती क्षेत्र में इस समय माहौल तो शांत है। सरकार वाइब्रेंट विलेज के तहत इन गांवों को विकास से जोड़ रही है। बोबिया और पानसर पंचायत के छह गांवों को इसके तहत चुना गया है। उम्मीद करते हैं कि तारबंदी के आगे वर्षों से खाली पड़ी भूमि पर नियमित खेती हो पाएगी। -भारत भूषण, पूर्व सरपंच बोबिया

गोलीबारी के दौरान लोगों को बार-बार पलायन करना पड़ता था,जब से सरकार ने घरों में बकर बनवाएं हैं, लोगों को बड़ी राहत मिली है, गांवों में अभी भी कुछ परिवारों के पास पक्के बंकर नहीं और उन्हें पक्के मकानों की भी आवश्यकता है। -देव राज पूर्व सरपंच लोंडी

घुसपैठ रोकने के लिए हीरानगर सेक्टर में बीएसएफ ने तारबंदी लगाई है। पानसर रठुआ,गंजराल, मनियारी में दो स्थानों पर लगी है, पुरानी तारबंदी जिस की अभी जरूरत नहीं है,हटा कर किसानों को उस में आई भूमि का किराया भी किसानों को देना चाहिए, यह मुद्दा पहले भी उठा चुके हैं। -शंभू सिंह पानसर

सीमावर्ती गांवों में 1150 शौचालय बनाने की जिम्मेदारी एक एनजीओ को सौपी थी, जिस ने काम अधूरा छोड़ दिया, अभी भी पांच सौ के करीब घरों में शौचालय नहीं हैं, व्यक्तिगत बंकरों में शौचालय की सुविधा नहीं है, गोलीबारी के दौरान लोग शोच के लिए खेतों में नहीं जा सकते। -भगवान दास, निवासी लडवाल।

सीमावर्ती गांवों के विकास के लिए वाइब्रेंट विलेज के तहत छह गांवों को चुना गया है, सीमावर्ती लोगों की समस्याएं सुनने के लिए समय समय पर बैठकों का आयोजन किया जाता है। तारबंदी में आई भूमि का कुछ गांवों की मुआवजा राशि मंजूर हुई है, उसके दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं। -फुलैल सिंह, एसडीएम, हीरानगर