Why Power Cuts Are

रिकॉर्ड बिजली मांग के बीच क्यों बढ़ रही कटौती? उत्पादन नहीं, सप्लाई सिस्टम बना सबसे बड़ी चुनौती

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Why Power Cuts Are

देश में भीषण गर्मी के बीच बिजली की मांग लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है। केंद्र सरकार इसे बिजली व्यवस्था की मजबूती का संकेत बता रही है, लेकिन दूसरी ओर कई राज्यों में बिजली कटौती और लो-वोल्टेज की समस्या लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनती जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि जब उत्पादन पर्याप्त बताया जा रहा है, तो आखिर उपभोक्ताओं तक निर्बाध बिजली क्यों नहीं पहुंच पा रही।

हाल ही में देश में बिजली की अधिकतम मांग करीब 271 गीगावॉट तक पहुंच गई, जिसे अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है। हालांकि इस दौरान करीब 1.7 गीगावॉट की कमी भी दर्ज की गई। इसका असर कई इलाकों में कटौती और ब्लैकआउट के रूप में देखने को मिला। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संकट सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक कई स्थानीय बिजली वितरण कंपनियां सिस्टम पर दबाव कम करने के लिए कुछ क्षेत्रों में जानबूझकर सप्लाई रोक देती हैं। इन कटौतियों का पूरा रिकॉर्ड आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज नहीं होता, जिस कारण कागजों में स्थिति सामान्य दिखाई देती है जबकि जमीनी स्तर पर लोग घंटों बिजली संकट झेलते हैं।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि देश में बिजली उत्पादन क्षमता जरूर बढ़ी है, लेकिन वितरण नेटवर्क उसी अनुपात में मजबूत नहीं हो पाया। कई राज्यों में पुराने ट्रांसफॉर्मर, कमजोर बिजली लाइनें और ओवरलोडेड सब-स्टेशन अब बड़ी चुनौती बन चुके हैं। निजीकरण के बाद मुनाफे वाले क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जबकि सरकारी बिजली कंपनियां आर्थिक दबाव से जूझती रहीं। इसका असर अब इंफ्रास्ट्रक्चर पर साफ नजर आने लगा है।

उत्तर प्रदेश में लगातार बिजली कटौती लोगों की नाराजगी का कारण बनी हुई है। वहीं बेंगलुरु के कई इलाकों में लंबे पावर कट और वोल्टेज फ्लक्चुएशन आम हो गए हैं। बिजली कंपनियां इसकी वजह ट्रांसफॉर्मर ट्रिपिंग, मरम्मत कार्य और मौसम को बता रही हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि घंटों तक बिजली गायब रहना अब रोजमर्रा की समस्या बन चुका है। केरल में भी अप्रैल के दौरान पीक ऑवर्स में बिजली कटौती करनी पड़ी क्योंकि राज्य अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदकर पूरा करता है।

तमिलनाडु में अप्रैल के दौरान बिजली मांग मई से भी अधिक दर्ज की गई। अतिरिक्त जरूरत को पूरा करने के लिए राज्य को शॉर्ट टर्म बिजली खरीदनी पड़ी। हालांकि आधिकारिक तौर पर लोड शेडिंग से इनकार किया गया, लेकिन चेन्नई समेत कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर बिजली बाधित होने की बात सामने आई।

विशेषज्ञों का कहना है कि सौर और पवन ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता भी ग्रिड प्रबंधन के लिए नई चुनौती बन रही है। मौसम बदलने या बादल छाने पर सोलर उत्पादन तेजी से घट जाता है, जिससे ग्रिड पर दबाव बढ़ जाता है। हालांकि कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आधुनिक तकनीक और बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली के जरिए इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत में असली चुनौती सिर्फ बिजली उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि उसे हर क्षेत्र तक बिना बाधा पहुंचाने की है। “वन नेशन-वन ग्रिड” व्यवस्था होने के बावजूद ट्रांसमिशन नेटवर्क की सीमाएं, स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर की कमजोरी और तेजी से बढ़ती मांग आने वाले समय में बिजली क्षेत्र के सामने और बड़ी चुनौती बन सकती हैं।