उत्तर प्रदेश की चुनावी रणभूमि: बीजेपी, सपा और नए समीकरणों की टक्कर

उत्तर प्रदेश की चुनावी रणभूमि: बीजेपी, सपा और नए समीकरणों की टक्कर

Uttar Pradeshs electoral battleground

Uttar Pradesh's electoral battleground

BJP ऐसी चुनावी मशीनरी है, जो थकती नहीं है. हार हो या जीत—चुनाव को उत्सव के रूप में मनाती है. हार से सीखती है और जीत के साथ अपना कारवां लगातार बढ़ाती जाती है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मतदान खत्म हुए, लेकिन बंगाल में वोटों की गिनती से पहले बीजेपी की उत्तर प्रदेश में चुनावी तैयारी शुरू हो गई है. हालांकि पश्चिम बंगाल में किसकी जीत और किसकी हार होगी, पूरे देश की नजर बनी हुई है लेकिन उसके पहले उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल बज चुकी है क्योंकि उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए अहम है. लोकसभा चुनाव में यूपी में मिली हार के बाद बीजेपी काफी चौकन्नी है. यूपी लोकसभा के साथ-साथ यूपी विधानसभा चुनाव भी अहम है, क्योंकि इसका असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है.


महिला बिल पर आर-पार

बात समझने की है कि बंगाल चुनाव खत्म होने के अगले दिन ही उत्तर प्रदेश विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र बुलाया गया है. इस सत्र का मुख्य फोकस महिला आरक्षण मुद्दे पर था. आदित्यनाथ सरकार लोकसभा में महिला आरक्षण बिल से संबंधित संशोधन विधेयक के पारित न होने और विपक्ष के रवैये के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाई, ताकि विपक्ष को घेरा जा सके. 

इसी दौरान सदन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिला आरक्षण बिल पर बोलते हुए कहा कि बीजेपी महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि विपक्षी दलों ने हमेशा इस बिल को टालने या इसमें बाधाएं डालने का काम किया. 

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ दलों ने महिला आरक्षण को जातीय और धार्मिक आधार पर बांटने की मांग कर इसके मूल उद्देश्य को कमजोर करने की कोशिश की. सपा ने मांग उठाई कि इस बिल में ओबीसी, दलित और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा तय किया जाए, ताकि आरक्षण का लाभ सिर्फ कुछ वर्गों तक सीमित न रह जाए.

महिला किस पर होंगी मेहरबान

देश में चुनाव की धुरी बदल गई है अब सारी पार्टियों की नजर महिलाओं पर ही है, क्योंकि चुनाव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ गई है और योगी सरकार यह दिखाना चाहती है कि बीजेपी सरकार महिलाओं की हितैषी है. बलात्कार, दहेज, महिला का शील हरण जैसे मुद्दों पर बीजेपी ने कानून व्यवस्था से नकेल कसने की कोशिश की है. 

बीजेपी मुलायम सिंह यादव के उस बयान का अक्सर जिक्र करती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “लड़के हैं तो गलतियां हो जाती हैं.” वहीं महिला आरक्षण बिल का स्वर्गीय मुलायम सिंह ने भी संसद में विरोध किया था और अखिलेश ने भी विरोध किया था. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और मुस्लिम को महिला आरक्षण बिल में आरक्षण दिया जाए.

बीजेपी की तैयारी

बीजेपी हमेशा चुनाव मोड में रहती है. एक खत्म होने के साथ दूसरे राज्यों में चुनाव की तैयारी शुरू हो जाती है. लोकसभा में करारी हार के बाद ही यूपी में चुनाव की तैयारी बीजेपी ने शुरू कर दी थी, लेकिन अब बंगाल में चुनाव खत्म होने के बाद पूरी मशीनरी यूपी में लग जाएगी. अमित शाह यूपी की रणनीति तय करेंगे और उस हिसाब से आगे की तैयारी शुरू होगी. उत्तर प्रदेश से लोकसभा की 80 सीटें आती हैं. 

2024 लोकसभा चुनाव में सपा को 36 सीटें, जबकि बीजेपी को 33 सीटें मिली थीं, जबकि इंडिया गठबंधन को 43 सीटें मिली थीं हालांकि कि एनडीए को 36 सीटें ही मिली थी. 

दरअसल, इंडिया गठबंधन का आरोप था कि बीजेपी सत्ता में आने पर संविधान बदल देगी और आरक्षण खत्म कर देगी. इसका असर यह हुआ कि बीजेपी के गैर-यादव ओबीसी और मायावती के जाटव वोटरों में इंडिया गठबंधन सेंध लगाने में कामयाब रहा. यही नहीं, अखिलेश यादव ने टिकट बंटवारे में रणनीति अपनाई—केवल 5 यादवों को टिकट दिया और गैर यादव ओबीसी पर ज्यादा जोर दिया. 

मुस्लिम उम्मीदवारों पर भी ज्यादा जोर नहीं दिया ताकि बीजेपी को हिंदू बनाम मुस्लिम करने का मौका नहीं मिले. वहीं बीजेपी पिछले 9 साल से सत्ता में है. अगले साल अगर पार्टी फिर जीत दर्ज करती है तो योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाकर एक तरह की “हैट्रिक” पूरी करेगी. लेकिन अगर हार होती है, तो यह बीजेपी के लिए न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि केंद्र की राजनीति में भी एक बड़ा झटका माना जाएगा.

पीडीए का चक्रव्यूह

अखिलेश की रणनीति रही है पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक पर जोर देना. इसकी आबादी करीब 80 फीसदी के आसपास मानी जाती है. अखिलेश की पकड़ मुस्लिम वोटर पर पहले से ही है, यादवों को छोड़कर अन्य पिछड़ा वर्ग पर उनका फोकस है. 

वहीं मायावती के दलित वोटरों पर भी उनकी नजर है. खासकर जिस तरह से मायावती शांत रही हैं, दलित वोटरों को लगता है कि कहीं न कहीं मायावती बीजेपी के साथ समझौता कर चुकी हैं. इसी कारण 2024 के चुनाव में उनका खाता नहीं खुला. 

हालांकि मायावती को अब चंद्रशेखर आज़ाद से भी चुनौती मिल रही है. चंद्रशेखर की भी नजर दलित वोटरों पर है. यही वजह रही कि मायावती की पार्टी कहीं से जीत नहीं पाई, लेकिन चंद्रशेखर ने नगीना लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर मायावती की चिंता बढ़ा दी है. लोकसभा में जीत के बाद अखिलेशा का हौंसला बुलंद है. 

क्या लोकसभा के तरह ही विधानसभा चुनाव में अखिलेश बीजेपी को फंसा पाएंगे ये एक बड़ा सवाल है हालांकि अखिलेश ने भी अपनी तैयारी पूरे जोरशोर से कर चुके हैं.

क्या ओवैसी अखिलेश का खेल बिगाड़ेंगे

पिछले चुनाव में ओवैसी की पार्टी AIMIM 95 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई. हालांकि बिहार में 5 सीटें जीतकर उसने ध्यान जरूर खींचा. ओवैसी ने भी कहा था कि मेरी मुसलमानों से अपील है कि ऐसे लोगों प भरोसा न करें. दरी बिछाने का काम न करें. मुसलमानों के विकास के लिए अपनी लीडरशिप होना बहुत जरूरी है. लगता है कि ओवैसी फिर से दांव आजमाएँगे हालांकि पिछली बार कुछ नही कर पाए.

सोशल इंजीनियरिंग का खेल

उत्तर प्रदेश में जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरण बहुत जटिल हैं. यहां का चुनाव यह दिखाता है कि कौन-सी पार्टी इन समीकरणों को बेहतर तरीके से साध पा रही है. बीजेपी की परीक्षा होगी कि वह अपने खोए वोटरों, खासकर गैर यादव पिछड़ा वर्ग, पर फिर से पकड़ मजबूत कर पाए. क्योंकि 2024 में ये वोटर छिटक गए. लोकसभा चुनाव के बाद पंकज चौधरी को प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया ताकि पिछड़ी जातियों पर असर पड़े वहीं बिहार में कुर्मी-कुशवाहा जाति के नेता सम्राट चौधरी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया है.

कानून व्यवस्था और विकास

योगी सरकार फिर से कानून व्यवस्था और विकास को मुद्दा बनाएगी. यूपी में कानून-व्यवस्था पर सख्ती की बात की जाती है. योगी सरकार यूपी की अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य बता रही है. यूपी का सकल घरेलू उत्पाद करीब 30 लाख करोड़ रुपये बताया जाता है और बजट करीब 9 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया है. योगी ने यह भी दावा किया है कि उनके कार्यकाल में 9 लाख लोगों को नौकरी दी गई है, जबकि 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों की बात कही गई है, जिनमें से 15 लाख करोड़ रुपये के निवेश को जमीन पर उतारने का दावा है. सरकार का कहना है कि इससे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होगा.

गठबंधन का खेल

2022 के लोकसभा चुनवा में सपा का कांग्रेस से गठबंधन नहीं हुआ था जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से सपा का गठबंधन हुआ था. 2022 में ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी  और जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी का अखिलेश से गठबंधन था लेकिन ये इस बार बीजेपी के साथ हैं. मायावती 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया था इसके बाद गठबंधन तोड़ लिया, अब वो किधर जाती हैं या अकेले लड़ती है, ये साफ नही हैं

यह चुनाव राज्य और केंद्र—दोनों स्तर के नेताओं के लिए बड़ा टेस्ट होता है. यहां की जीत से नेतृत्व मजबूत होता है, जबकि हार से रणनीति पर सवाल उठते हैं, जीत से सत्ता यूपी से होकर गुजरती है. पश्चिम बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश का चुनाव इसलिए अहम है क्योंकि यह देश की राजनीति का ट्रेंड सेट्टर माना जाता है.