Time to end the distance between JJP and INLD in Haryana

Editorial:हरियाणा में जजपा-इनेलो के बीच दूरियां खत्म होने का समय

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Time to end the distance between JJP and INLD in Haryana

Time to end the distance between JJP and INLD in Haryana: हरियाणा में बदली परिस्थितियों में जजपा को जहां चुनौतीपूर्ण समय का सामना करना पड़ रहा है, वहीं इनेलो के समक्ष भी अस्तित्व का संकट कायम है। हालांकि दोनों दल एक ही परिवार से निकले हैं, राजनीतिक रूप से भी दोनों की विचारधारा मेल खाती है, सामाजिक रूप से भी दोनों में रक्त संबंध हैं। बावजूद इसके दोनों के बीच मनमुटाव का दौर खत्म नहीं हो रहा। हालांकि सत्ता से बेदखल कर दी गई कि जजपा के नेताओं के स्वर अब जिस प्रकार बदलते दिख रहे हैं, वे सभी को चौंका रहे हैं। लेकिन इनेलो के प्रधान महासचिव का तर्क है कि अब समय बीत गया है। अब दोनों दलों के एक होने की संभावना खत्म हो चुकी है। बावजूद इसके जजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का तर्क है कि अगर बड़े चौटाला साहब यानी ओमप्रकाश चौटाला कहें तो वे कभी भी आने को तैयार हैं।

वास्तव में परिवार और राजनीति के बीच जैसी दीवार चौटाला परिवार में खींची हैं, उनसे प्रदेश की राजनीति को नुकसान पहुंचा है। एक समय हरियाणा में इनेलो का डंका बजता था, लेकिन फिर परिवार के अंदर कुछ ऐसा हुआ कि न परिवार एक रहा और न ही इनेलो। दोनों परिवार अलग हो गए। बड़े भाई अजय चौटाला के पुत्रों ने रातों-रात अपनी अलग पार्टी खड़ी कर दस सीटें भी जीत ली। लेकिन छोटा भाई अभय चौटाला अपने अलावा कोई सीट नहीं जीत सका। इसके बाद से इनेलो जहां रसातल की ओर जाती दिख रही है, वहीं जजपा सत्ता से  बेदखल करने के बाद अपने खराब समय का सामना कर रही है।

जजपा के संबंध में सामने आ रहा है कि उसके पांच-छ विधायक भाजपा के खेमे में जाने को तैयार हंै। इसका आधार बहुत पहले से तैयार हो चुका था, लेकिन जैसे ही भाजपा और जजपा का मोह भंग हुआ तो जजपा के अंदर भगदड़ मच गई। सबसे बढक़र पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष निशान सिंह ही पार्टी को अलविदा कह गए। सत्ता में रहते अनुशासन से बंधे रहे पार्टी नेता एवं विधायकों की सत्ता से बाहर होते ही बेचैनी गंभीर बात हो गई। सभी यही पूछ रहे हैं कि एकाएक आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस संगठन को एकजुट रखने के लिए पूरी पार्टी सक्रिय थी, फिर उसे छोड़ कर सभी जाने लगे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय चौटाला का बयान है कि पार्टी में जाने और आने का दौर जारी रहता है।

बेशक, राजनीति में ऐसा ही होता है, लेकिन जजपा जिसका जन्म हुए ही अभी पांच साल भी नहीं हुए हैं, के साथ ऐसा होना राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका रहा है। क्या इसकी वजह पार्टी नेतृत्व के प्रति नाराजगी है या फिर जजपा का प्रदेश में कोई भविष्य नहीं रहा। जजपा के साथ एक और संकट यह कायम हो गया है कि प्रदेश में जहां भी उसके नेता जा रहे हैं, वहीं किसान और ग्रामीण उनका विरोध कर रहे हैं। कह रहे हैं कि किसान आंदोलन के दौरान जजपा ने सरकार में रहते कोई काम नहीं किया। अब हालात ऐसे हैं कि जजपा नेताओं को इसके लिए क्षमा प्रार्थी होना पड़ रहा है। हालांकि अगर जजपा आज भी भाजपा के साथ सरकार में होती तो संभव है, ऐसा नहीं हुआ होता।

वास्तव में जजपा ने वही किया है, जोकि एक नवोदित राजनीतिक दल को करना चाहिए था। वह चुनाव में उतरी और एक बड़े राजनीतिक दल को समर्थन देकर सरकार में स्थान पाया। अगर किसान आंदोलन की वजह से वह सरकार से हट जाती तो क्या इससे पार्टी का कोई भला हो सकता है। एक राजनीतिक दल को आगे बढ़ने का मौका सत्ता में रहते ही मिलता है। सरकार में रहते हुए जजपा नेताओं ने अनेक योजनाओं को लागू कराया है, निजी क्षेत्र की नौकरियों में 75 फीसदी आरक्षण का कानून जजपा की वजह से ही हरियाणा में लागू हो सका है। भाजपा ने अपने साढ़े नौ साल के शासनकाल में अनेक नीतियां, कार्यक्रम और योजनाएं धरातल पर उतारी हैं, लेकिन विपक्ष के लिए उनका कोई मोल नहीं है। वहीं जनता भी उनकी आलोचना करती हो सकती है। इसी प्रकार आज अगर जजपा को विरोध का सामना करना पड़ रहा है तो इसकी वजह भी राजनीतिक है।

दरअसल, बदले परिदृश्य में जजपा और इनेलो नेताओं को यह विचार करने की जरूरत है कि क्या वास्तव में वे एक होकर आगे बढ़ सकते हैं। यह कितना विचित्र है कि राजनीति ने एक परिवार को बांट दिया। लेकिन जब अधिकार और वर्चस्व की बात आती है तो ऐसा होना स्वाभाविक ही कहा जाएगा। बेशक, इनेलो और जजपा का गठजोड़ प्रदेश में नए समीकरणों को जन्म दे सकता है। ऐसा हुआ तो यह प्रदेश में तीसरी ताकत की पुनर्स्थापना का प्रयोजन होगा। 

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