संघर्ष से सफलता तक: देहरादून की इन 'सुपर मदर्स' ने ई-ऑटो के हैंडल से बदली परिवार की तकदीर
These 'Super Mothers' from Dehradun Transformed
देहरादून। सुबह बच्चों का टिफिन तैयार करना, उन्हें स्कूल भेजना, फिर खुद ई-ऑटो का हैंडल संभालकर सड़कों पर उतर जाना… यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि देहरादून की उन मांओं की है जिन्होंने संघर्ष को कमजोरी नहीं, ताकत बना लिया। मदर्स डे पर ऐसी ही दो महिलाओं बीना क्षेत्री और रानू रावत की कहानी हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है।
एमडीडीए भगत सिंह कालोनी निवासी बीना के ऑटो चालक पति उदय सिंह की मई-2021 में कोरोना से मौत हो गई थी। अचानक लगे इस आघात के बाद चुनौती परिवार को संभालने की थी। शुरुआत में ऑटो किराये पर दिया, लेकिन चालकों ने पैसा नहीं दिया। दो माह तक ऑटो घर खड़ा रहा तो बच्चों के पालन का संकट खड़ा हो गया।
किसी रिश्तेदार ने मदद नहीं की। बेटा अक्षय उस समय 14 साल का था जबकि बेटी परी सिर्फ आठ साल की। बीना ने ऑटो खुद चलाने की सीखी लेकिन किसी ने नहीं सिखाया। चूंकि, बेटा अकसर पिता के साथ ऑटो पर जाता था तो उसे थोड़ा-बहुत चलाना आता था।
बस, बीना ने बेटे का हाथ थामा और सुबह-शाम निकल पड़ी ऑटो चलाना सीखने। कुछ दिन बाद ही बीना ने खुद ऑटो का हैंडल थाम लिया और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए सुबह से रात तक ऑटो चला रही हैं। बेटा अक्षय भी पढ़ाई के साथ एक दुकान में काम कर मां का सहारा बन रहा है।
पति की मौत के बाद टूटी नहीं बीना
पति की मौत के बाद दो बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और भविष्य की चिंता, सब कुछ एक साथ बीना क्षेत्री के सामने था। बीना ने हिम्मत जुटाई और पति के ई-ऑटो का हैंडल थामने का मन बना लिया। शुरुआत आसान नहीं थी।
ट्रैफिक, लंबे घंटे और समाज की तानेबाजी, हर मोर्चे पर लड़ाई थी। लेकिन मां हार मानने वालों में नहीं थी। बीना कहती हैं, 'बच्चों की फीस भरनी थी। उनके सपने अधूरे नहीं छोड़ सकती थी। इसलिए डर को पीछे छोड़ सड़क पर उतर गई।' आज बीना न सिर्फ आत्मनिर्भर हैं, बल्कि दूसरी महिलाओं के लिए भी मिसाल बन चुकी हैं।
'मम्मी, किसी की मम्मी ऑटो नहीं चलाती…'
देहरादून की रानू रावत जब पहली बार ई-ऑटो लेकर सड़क पर उतरीं तो लोगों की निगाहों से ज्यादा उन्हें अपने बच्चों की चिंता थी। शुरुआत में बच्चों को भी अजीब लगता था कि उनकी मां सड़क पर ऑटो चलाती है। लेकिन रानू ने हार नहीं मानी।
रानू कहती हैं, 'घर का खर्च बढ़ रहा था। बच्चों की पढ़ाई और भविष्य के लिए कुछ करना जरूरी था। शुरुआत में लोगों ने बातें बनाईं, लेकिन अब वही लोग सम्मान से देखते हैं।' अब हालात यह हैं कि रानू रोज शहर की सड़कों पर यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के साथ अपने बच्चों के सपनों को भी मंजिल तक पहुंचा रही हैं।
दिनभर सड़क पर, रात में मां की जिम्मेदार
दोनों महिलाओं की जिंदगी सिर्फ ऑटो चलाने तक सीमित नहीं। सुबह घर संभालना, बच्चों को तैयार करना, दिनभर सड़कों पर मेहनत करना और रात में परिवार की देखभाल, उनकी दिनचर्या लगातार संघर्ष से भरी है। इन महिलाओं का कहना है कि सबसे बड़ी खुशी तब मिलती है, जब बच्चे गर्व से कहते हैं 'हमारी मां मजबूत है।'
समाज की सोच भी बदली
शुरुआत में महिला ड्राइवरों को देखकर लोग हैरान होते थे, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। दून अस्पताल के पास महिलाओं के लिए बनाए गए पिंक ई-ऑटो स्टैंड से ऑटो चला रहीं महिलाएं धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तीकरण का प्रतीक बन रही हैं। मदर्स डे पर रानू व बीना जैसी मांएं यह संदेश देती हैं कि मां सिर्फ घर संभालने वाली नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर पूरे परिवार की ढाल बन जाती है।