हिमाचल सरकार हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में देगी चुनौती
The Himachal government will challenge
शिमला। The Himachal government will challenge, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट अतिरिक्त मुख्य सचिव (एसीएस) को राज्य परिवहन प्राधिकरण (एसटीए) और परिवहन निदेशक को क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण (आरटीए) के अध्यक्ष पद से हटाने के आदेश को सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। सरकार के स्तर पर इसको लेकर प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने बीते दिनों अधिवक्ताओं को इसके निर्देश दे दिए हैं।
मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद अधिवक्ताओं की टीम ने इस पर काम शुरू कर दिया है। जल्द ही उच्च न्यायालय के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
2023 की अधिसूचना को किया था रद
बीते सप्ताह न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर व न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने 29 मई 2023 को जारी उस अधिसूचना को रद कर दिया था, जिसके तहत इन नियुक्तियों को वैध बताया गया था। अदालत ने दोनों अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से इन पदों पर काम नहीं करने का आदेश दिया है।
31 मार्च तक एसटीए और आरटीए का पुनर्गठन का आदेश
इसके साथ अदालत ने प्रदेश सरकार को ये भी आदेश दिए हैं कि 31 मार्च तक एसटीए और आरटीए का पुनर्गठन कानून के अनुसार कर पात्र व निष्पक्ष व्यक्तियों को अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जाए। नई नियुक्तियों तक प्राधिकरण के अन्य सदस्य केवल रोजमर्रा के जरूरी काम करेंगे, लेकिन वे रूट परमिट देने या नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार नहीं रखेंगे।
फैसले अवैध नहीं माने जाएंगे
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन अधिकारियों की ओर से अब तक चेयरमैन के रूप में लिए गए फैसले अवैध नहीं माने जाएंगे, ताकि प्रशासनिक अव्यवस्था न फैले।
इसलिए ठहराए थे अयोग्य
अदालत ने पाया कि ये दोनों अधिकारी हिमाचल पथ परिवहन निगम के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स (बीओडी) में पदेन सदस्य हैं। मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 68(2) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जिसका किसी परिवहन उपक्रम (जैसे एचआरटीसी) में वित्तीय हित हो, वह निष्पक्षता के लिए एसटीए या आरटीए का सदस्य या अध्यक्ष नहीं बन सकता। अदालत ने माना कि एचआरटीसी के निदेशक के रूप में इन अधिकारियों का संस्थान के वित्तीय प्रबंधन और जवाबदेही से सीधा संबंध है, जो उन्हें इस पद के लिए अयोग्य बनाता है।
आनंद मोदगिल ने दी थी चुनौती
याचिकाकर्ता आनंद मोदगिल ने परिवहन सचिव को एसटीए और परिवहन निदेशक को प्रदेश के सभी आरटीए का चेयरमैन नियुक्त करने के फैसले को चुनौती दी थी। इसमें तर्क दिया गया था कि एचआरटीसी एक सरकारी उपक्रम है और निजी ऑपरेटरों के साथ प्रतिस्पर्धा करता है, इसलिए इन अफसरों का राज्य परिवहन प्राधिकरण और क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण का अध्यक्ष होना कानूनन गलत है।