वो अजनबी राहगीर .... !!
वो अजनबी राहगीर .... !!

वो अजनबी राहगीर .... !!

वो अजनबी राहगीर .... !!

विजय निगम 

लखनऊ। दिसंबर की एक सर्द  संध्या में  कोहरा भी काफी था। ऐसे में लता को रात्रि 8:30 की ट्रेन पकड़नी थी वापस घर जाने के लिए ...
कानपुर  से लखनऊ वो अपने मम्मी पापा से मिलने आई थी और पति राजेश  आँफिस की व्यस्तता के चलते उसके साथ नहीं आए थे ।... 
खैर..... इससे पहले भी वो अकेले सफर कर चुकी थी मगर उस दिन शाम को कुछ ज्यादा ही कोहरा छाया था। स्टेशन पहुंची तो पता चला उसकी ट्रेन पांच घंटे लेट है।
 मायके में घर में मां अकेली थी इसलिए उसने पिताजी को स्टेशन से तुरन्त वापस भेज दिया ,मगर मन में डर था कि अब अकेले स्टेशन पर वो कैसे पांच घंटे बिताएगी ।.....
टिकट एसी कोच का था इसीलिए वो वैंटिंग रुम में पहुंची मगर वहां सिर्फ दो पुरूष थे । 
वो भय के चलते गेट के पास वाली बैंच पर बैठ गई ।कुछ देर में उन दो पुरुष यात्रियों में से एक उठकर चला गया। शायद उसकी ट्रेन आ गई थी। अब उस कमरे में केवल लता और वो अजनबी पुरुष था।  .....
     वो अजनबी चुपचाप अखबार को धीमी रोशनी में पढने की कोशिश कर रहा था ।अभी कुछ  समय ही बीता था कि बाहर से कुछ लोगों की आवाजें आने लगी ।शायद उनकी भी ट्रेन लेट थी लेकिन वो जब अंदर आए तो उनके साथ शराब की बदबू भी आनी शुरू हो गई । लता को अब कुछ सही नहीं महसूस हो रहा था क्योंकि हालात ही कुछ ऐसे थे। ,, ,,
वो ही उस कमरे में एक अकेली महिला थी और उस कमरे में पुरुषों की संख्या अब चार थी। 
ऊपर से आए दिन समाज में होती रेप जैसी वारदातों से पहले ही  लता का मन घबराया हुआ था ।
अचानक कमरे में पहले बैठे पुरुष यात्री ने अपना बैग उठाया और लता के पास आकर दोनों के बीच बैग रखकर, वहीं बैठ गया ।
लता अब भी खौफ में थी तभी एक चायवाले ने अंदर आते आवाज दी :-चाय गरम चाय ... ..
उस पुरुष यात्री ने दो चाय का इशारा किया एक स्वयं लेकर दूसरी लता को देने को कहा !

चायवाले ने वैसा ही किया इससे पहले लता चाय के पैसे देती कि उस अजनबी ने लता की चाय के पैसे भी दे दिए। ...
समय बीता और ट्रेन की घोषणा हुई उस अजनबी की ट्रेन आ गई थी।
 पहले तो वो उठा फिर बोला-अरे क्या बात है चलिए ना दीदी अपनी ही ट्रेन आने की घोषणा हुई है ? ....
लता ने एकटक उसे देखा और फिर उन तीनों शराबियों को देखा ...!!
वो चुपचाप उठी और  बाहर चल दी।
 बाहर पहुंचकर उस अजनबी ने कहा- देखिए मुझे नहीं पता ये आपकी ट्रेन है या नहीं बहन   !...
पर मुझे उन शराबियों के बीच आपको अकेले बैठे छोडने का मन नहीं किया इसीलिए... !!
वैसे ये मेरी ट्रेन तो है अगर आपकी भी हो तो आप अपने कोच की तरफ चले जाइए ! ...
लता ने कहा-जी ...ये मेरी ट्रेन नहीं है, अभी कुछ और वक्त लगेगा । ...आप जाइए !
उस अजनबी ने एक बार कुछ सोचा और फिर कहा- बहन !   आप घबराइए नहीं ...

मैं अगली ट्रेन पकड लूंगा, मगर ऐसी स्थिति में जैसे हर भाई को करना चाहिए मैं भी वहीं करूंगा । .....
और उसने वो ट्रेन छोड दी ..!!.
कुछ समय बाद लता की ट्रेन आई तो उस अजनबी ने लता को उसके कोच मे बैठने में मदद की और बाहर खडे होकर ट्रेन चलने का इंतजार करने लगा।
 जैसे जैसे ट्रेन आगे बढ़ने लगी वैसे वैसे वो अजनबी लता की नजरों से दूर होता गया। 
लता ने दोनों हाथों को जोड़कर उस अजनबी को धन्यवाद दिया और उस अजनबी के लिए अपने भगवान से प्रार्थना करने लगी। ....वो मन में विचार करने लगी,  शायद आज उसे समाज में होती वारदातों से जो भरोसा, जो विश्वास खो रहा था । फिर  से  वापस उसे वहीं भरोसा, वही विश्वास महसूस हो रहा था ।
मेरे स्वजनों ! ...सचमुच पांचो अंगुलियां बराबर नहीं होती हैं। 

आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग मौजूद है जो अपने घरों की तरह बाहर समाज में बहन, बेटियों की इज्ज़त करते हैं ।
उनका सम्मान करते है और जहां एक अभिभावक की तरह उनकी रक्षा को खडे होना होता है । वो वहां मौजूद रहते हैं। मित्रों समाज  की संस्कृति हमारे चरित्र व योगदान से ही सुरक्षित  है।  भारत मां की जय हो ,ऐसे  चरित्रवान भाइयों की जय हो !!