राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की अंतरिम जमानत रद्द की, न्याय के पक्ष में बड़ा फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की अंतरिम जमानत रद्द की, न्याय के पक्ष में बड़ा फैसला

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Rajasthan High Court Cancels Asaram's Interim Bail

Rajasthan High Court Cancels Asaram's Interim Bail, नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है. अदालत ने स्वास्थ्य कारणों के आधार पर दी गई उनकी अंतरिम जमानत को आगे बढ़ाने से इनकार करते हुए राहत समाप्त कर दी. करीब 2 साल से लगातार बढ़ाई जा रही अंतरिम जमानत पर अब रोक लगने के बाद आसाराम को फिर से न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना होगा. राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता के अधिकारों और न्याय की भावना को प्रमुखता देते हुए कहा कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़ित पक्ष की चिंताओं और उसके जीवन पर पड़े प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

अदालत ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में न्याय केवल आरोपी के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़िता के सम्मान, सुरक्षा और न्याय की अपेक्षाओं की भी रक्षा की जानी चाहिए.

पीड़िता की ओर से जमानत का विरोध

सुनवाई के दौरान आसाराम की ओर से बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला देकर अंतरिम जमानत जारी रखने की मांग की गई थी. बचाव पक्ष का तर्क था कि 86 वर्षीय आसाराम विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हैं और उन्हें चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता है. वहीं अभियोजन पक्ष और पीड़िता की ओर से इस मांग का विरोध किया गया. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने राहत बढ़ाने की मांग अस्वीकार कर दी.

गौरतलब है कि यह मामला वर्ष 2013 का है. मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा स्थित एक गुरुकुल में पढ़ने वाली नाबालिग छात्रा ने आरोप लगाया था कि जोधपुर के निकट स्थित आश्रम में उसके साथ यौन शोषण किया गया. शिकायत के बाद पुलिस ने पोक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी.

कोर्ट ने कहा पीड़िता को नजरअंदाज नहीं कर सकता

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश से भी सहमति जताई, जिसमें आसाराम को किसी भी तरह की नरमी देने से मना किया गया था, और कहा: "उस समय अपीलकर्ता की उम्र 73 साल थी. अब वह 86 साल का है. इस तरह वह हमारे सामने उम्र के बोझ से झुका हुआ और बीमारियों से घिरा हुआ है. वह नरमी बरतने की अपनी गुहार पर एक बार फिर से विचार करने की विनती कर रहा है. हमने उसकी गुहार पर विचार किया और अपना दिमाग लगाया. हम उसे किसी भी तरह की रियायत नहीं दे सकते, क्योंकि उसकी शारीरिक कमज़ोरी की आड़ में पीड़िता की आवाज़ को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं ठहराया जा सकता.

यह आवाज़ शांत है. लेकिन बेहद असरदार है. इसे गलत साबित नहीं किया जा सकता. इसे नज़रअंदाज़ करने का मतलब होगा समाज का आपराधिक न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ जाना, और एक ऐसा गलत संदेश देना, जो किसी भी कोर्ट को कभी नहीं देना चाहिए,खासकर तब, जब अपराध करने वाला व्यक्ति खुद को 'भगवान का दूत' बताने वाले चोले के पीछे छिपा हो.

हाई कोर्ट ने तथ्यों के साथ की टिप्पणी

कोर्ट ने कहा, पीड़िता की आवाज़ को भी सुना जाना ज़रूरी है. वह इस कोर्ट में सहानुभूति मांगने नहीं, बल्कि इंसाफ़ मांगने आई है. वह अपने साथ एक ऐसी कड़वी सच्चाई लेकर आई है: कि अपीलकर्ता के लिए जेल की सज़ा सिर्फ़ शारीरिक है. उसकी कैद की दीवारें हैं. लेकिन पीड़िता की सज़ा की कोई दीवार नहीं है. उसके लिए कभी कोई वारंट जारी नहीं हुआ. किसी भी कोर्ट ने उसे यह सज़ा नहीं सुनाई." फिर भी यह उस पर उसी पल थोप दिया गया, जब इस 'धर्मगुरु' ने अपनी कसमों के बजाय कानून और नैतिकता के उल्लंघन को चुना. उसकी आत्मा को मिली यह सज़ा आजीवन है; यह स्याही से नहीं, बल्कि एक ऐसी अमिट पीड़ा से लिखी गई है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता.

इसमें न कोई माफ़ी है, न कोई पैरोल, और न ही कोई अपील का रास्ता. क्योंकि, बलात्कार की शिकार महिला सिर्फ़ एक ज़ख्म लेकर नहीं जीती. वह अपने साथ अपने सम्मान, अपनी पहचान और उस 'स्व' के मिट जाने का बोझ ढोती है ,वह 'स्व' जो उस पल से पहले उसका अपना था, जिस पल ने न सिर्फ़ उसे पूरी तरह तबाह कर दिया, बल्कि उसकी ज़िंदगी को 'उस पल से पहले' और 'उस पल के बाद'—इन दो हिस्सों में बांट दिया. यह उल्लंघन सिर्फ़ उस कुकृत्य के खत्म होने के साथ ही खत्म नहीं हो जाता. यह हर पल की खामोशी में भीड़ से भरे हर कमरे में और हर उस आम दिन में गूंजता रहता है, जिसे इसकी अमिट याद ने असहनीय बना दिया. यह देखते हुए कि आसाराम अंतरिम ज़मानत पर था, अदालत ने उसकी ज़मानत रद्द की और उसे आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया. साथ ही यह भी आदेश दिया कि उसकी गिरफ़्तारी के लिए वारंट जारी किए जाएं.

हालांकि कोर्ट के फैसले के बाद आसाराम ने जोधपुर जेल में सरेंडर कर दिया है वही उसकी तरफ से राजस्थान हाई कोर्ट में घर का खाना और इलाज के लिए आरोग्यं अस्पताल में इलाज करवाने की अनुमति के लिए याचिका दाखिल की है जहां 3 जून को राजस्थान हाई कोर्ट में आरोग्यम में इलाज करवाने के लिए अनुमति मिलेगी या नहीं इस पर सुनवाई होगी.