उत्तराखंड में 'गुलदार' संकट: क्षमता से 4 गुना अधिक हुई आबादी; पौड़ी-टिहरी में दहशत का साया; विशेषज्ञों ने चेताया

उत्तराखंड में 'गुलदार' संकट: क्षमता से 4 गुना अधिक हुई आबादी; पौड़ी-टिहरी में दहशत का साया; विशेषज्ञों ने चेताया

Leopard Crisis in Uttarakhand

'Leopard' Crisis in Uttarakhand

हरिद्वार। 'Leopard' Crisis in Uttarakhand, उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर और चिंताजनक समस्या के रूप में उभरता जा रहा है।

वन्यजीव विशेषज्ञ एवं गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और कुलसचिव डा. दिनेश चंद्र भट्ट के अनुसार उत्तराखंड में गुलदार की संख्या जंगलों की धारण क्षमता से कई गुना अधिक हो चुकी है, जिससे यह संघर्ष लगातार बढ़ रहा है।

यह तथ्य टिहरी और पौड़ी गढ़वाल में किए गए अध्ययन में सामने आया है। इस अध्ययन का शोध पत्र रूस की वैज्ञानिक पत्रिका बायोलाजी बुलेटिन में भी प्रकाशित हुआ है।

डा. दिनेश चंद्र भट्ट बताते हैं कि वर्तमान में उत्तराखंड में 2,275 से अधिक गुलदार मौजूद हैं, जबकि राज्य के जंगलों की क्षमता के अनुसार यह संख्या लगभग 500 के आसपास ही संतुलित मानी जाती है।

एक गुलदार का होम रेंज, अर्थात शिकार करने का क्षेत्र, लगभग 30 से 50 वर्ग किलोमीटर होता है।

इस दृष्टि से राज्य के कुल 24,686 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में सीमित संख्या में ही गुलदारों का सुरक्षित निवास संभव है।

शेष गुलदार भोजन और क्षेत्र की तलाश में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों, कृषि भूमि और झाड़ीदार जंगलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।

डा. दिनेश चंद्र भट्ट टीम की ओर से टिहरी जिले में किए गए अध्ययन के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में प्रतिवर्ष औसतन तीन लोगों की मृत्यु गुलदार के हमलों में हुई, जबकि सात लोग घायल हुए।

इसी अवधि में भालू के हमलों में औसतन एक व्यक्ति की मृत्यु और सात लोग घायल हुए। वहीं, वर्ष 2021 और 2022 के आंकड़े बताते हैं कि इन दो वर्षों में 172 पालतू पशु गुलदार के हमलों का शिकार बने। पौड़ी गढ़वाल जिले की स्थिति और भी गंभीर है।

वर्ष 2025 में ही 15 से अधिक लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हो चुकी है, जबकि पिछले पांच वर्षों में यह आंकड़ा 27 तक पहुंच गया है।

यह स्थिति न केवल मानव जीवन के लिए खतरा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डाल रही है। शोध में यह तथ्य भी सामने आया है कि 65 प्रतिशत स्थानीय लोगों ने विदेशी वनस्पति ‘लैंटाना’ के अत्यधिक फैलाव को इस संघर्ष का मुख्य कारण माना है।

यह झाड़ी तेजी से फैलती है और घने झुरमुट बनाकर गुलदार एवं अन्य वन्य जीवों को छिपने के लिए सुरक्षित स्थान प्रदान करती है।

इसके अतिरिक्त, विकास कार्यों का विस्तार और जंगलों में लगने वाली आग को भी इस समस्या के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में जंगली जानवरों का दबाव भी बढ़ता जा रहा है।

किसानों की आजीविका हो रही प्रभावित

डा. दिनेश चंद्र भट्ट के अनुसार, पौड़ी गढ़वाल के अधिकांश गांवों में जंगली सूअर, बंदर और मोर बड़ी संख्या में फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है।

वहीं, उत्तराखंड के लगभग 3940 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जो पलायन की गंभीर समस्या को दर्शाता है।

पलायन, रसोई गैस की उपलब्धता और पशुपालन में कमी के कारण ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता घट गई है।

इससे बंजर खेतों में फिर से जंगल और लैंटाना जैसी झाड़ियां फैल रही हैं, जो वन्य जीवों के लिए अनुकूल आवास बनती जा रही हैं।

वे यह भी कहते हैं कि यह धारणा गलत है कि जंगलों में भोजन की कमी के कारण वन्य जीव आबादी क्षेत्रों की ओर आ रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में सघन वनों का क्षेत्रफल और वन्य जीवों की संख्या दोनों में वृद्धि हुई है।

टीम में ये रहे शामिल

  • डा. दिनेश चंद्र भट्ट, हरिद्वार
  • डा. मोहन कुकरेती, पीजी कालेज जयहरीखाल
  • डा. विनय सेठी, उत्तराखंड संस्कृत विवि.
  • डा. रोमेश, पतंजलि विवि
  • डा. त्रिभुवन पीजी कालेज डोईवाला
  • डा. आशीष, ग्राफिक एरा विवि
  • डा. विकास सैनी रुड़की