EVM manipulation
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Editorial:ईवीएम में हेर फेर की आशंकाओं का निवारण होना जरूरी

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It is necessary to eliminate the possibility of EVM manipulation

It is necessary to eliminate the possibility of EVM manipulation चुनाव मतलब विवाद। विवाद मतलब ईवीएम। यह कहना कोई अनुचित नहीं होगा कि देश में जब भी चुनाव होते हैं, ईवीएम पर अंगुली उठती है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ने भारत जैसे भूभाग वाले देश में मतदान को आसान बना दिया है। एक समय वह भी था कि चुनाव होने के बाद मतगणना में ही चार-पांच दिन का समय लग जाता था। लेकिन आजकल उसी दिन मतगणना का परिणाम आ जाता है। क्या ईवीएम ने देश का जीवन सहज नहीं बनाया है, फिर इस पर आरोप क्यों? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपैट पर्चियों की ईवीएम से शत प्रतिशत मिलान की मांग पर सुनवाई के दौरान जो बातें माननीय अदालत ने जाहिर की हैं, वे ईवीएम पर उठने वाले सवालों का उचित जवाब है।

अदालत का कहना है कि इस संबंध में भरोसा करना होगा और सिस्टम को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। वास्तव में कहा यह गया है कि ईवीएम के जरिये सत्ताधारी राजनीतिक दल चुनाव में धांधली करते हैं, हालांकि अचरज वाली बात यह है कि ऐसे आरोप उसी राजनीतिक दल की ओर से लगाए जाते हैं, जोकि चुनाव हार गया है, या हार रहा होता है। जब हालात उसके पक्ष के होते हैं, तो उसके आरोप यह नहीं होते। उस समय ईवीएम एक सशक्त माध्यम होता है, चुनाव का। कांग्रेस ने हालिया दो-तीन राज्यों में चुनाव जीता था, लेकिन पार्टी की ओर से इस दौरान ईवीएम पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया गया।

 वास्तव में यह देश को फिर से उसी मध्ययुग में ले जाने की चाह है कि चुनाव बैलेट पेपर से होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता संगठन की ओर से एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह मांग रखी है। हालांकि उन्हें इसका जवाब भी माननीय अदालत की ओर से मिल गया, जब उन्हें कहा गया कि बैलेट से चुनाव में क्या होता था, यह आप भूल गए होंगे, लेकिन हमें याद है। दरअसल, बैलेट पेपर से चुनाव के दौरान हिंसा, बूथ कैप्चरिंग और वोट पर्चियों को छिपाने के ऐसे हथकंडे अपनाए जाते थे, जिनसे लोकतंत्र की स्वतंत्रता पर अपराध की कालिख के दाग पड़ते थे। हालांकि ईवीएम की प्रणाली सामने आने के बाद इस पर रोक लग गई।

इस समय देश में सबसे शक्तिशाली अगर कोई संस्था है तो वह चुनाव आयोग ही है। भारत में चुनाव आयोग ने सुधारीकरण का वह दौर चलाया है, जोकि दूसरे देशों के लिए आदर्श बन चुका है। चुनाव आयोग की भूमिका इस तरह प्रकाशमान है, जिस पर भरोसा करके आगे बढ़ा जा सकता है। हालांकि विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए चुनाव आयोग सरकार का मोहरा कहलाता है। ऐसे आरोप अनुचित ही कहे जाएंगे, क्योंकि इनसे आयोग की गरिमा को नुकसान पहुंचता है। ईवीएम पर उठने वाले सवालों के जवाब में अनेक बाद आयोग ने राजनीतिक दलों को चुनौती दी है कि ईवीएम को हैक करके दिखाएं। लेकिन यह संभव नहीं हो सका है। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि मानवीय हस्तक्षेप से समस्याएं पैदा होती हैं, वहां मानवीय कमजोरियां और पूर्वाग्रह हो सकता है, लेकिन सामान्य तौर पर मानवीय हस्तक्षेप के बगैर मशीन एकदम सटीक परिणाम देगी।

यह उचित ही है कि चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट ने मतदान से लेकर मतगणना तक अपनाई जाने वाली पूरी प्रक्रिया, आंकड़े और ईवीएम मशीन, वीवीपैट आदि की सुरक्षा की होने वाली व्यवस्था के बारे में बताने को कहा है। आयोग से यह भी पूछा गया है कि हेरफेर करने पर सजा का प्रावधान क्या है और कितनी सजा है। वास्तव में ईवीएम के संबंध में ऐसे सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है, जोकि लंबे समय से अनुत्तर हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी होती है, लेकिन क्या सिस्टम को पूरी तरह से खारिज किया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पूरा ढांचा ही ढह जाएगा। उन लोगों को जोकि ईवीएम में धांधली के आरोप लगाते हैं, यह साबित करना होगा कि आखिर ऐसा कैसे किया जा सकता है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम के संबंध में दाखिल याचिका के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से कहा गया है कि हेरफेर किया जा सकता है। यानी अभी तक हेरफेर हुआ नहीं है और यहां बात भविष्य की हो रही है। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट की ओर से ईवीएम पर उठने वाले सवालों को लेकर जो सुनवाई शुरू हुई है, वह निश्चित रूप से किसी निर्णायक बिंदु पर पहुंचेगी। हालांकि यह जरूरी है कि व्यवस्था पर भरोसा किया जाए। बगैर भरोसे के देश भी नहीं चल पाएगा, जिसे धांधली करनी होगी वह करेगा, लेकिन वह पकड़ा भी जाएगा। 

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