बाज बटालियन, रुद्र ब्रिगेड, अश्नि ड्रोन प्लाटून ... जनरल द्विवेदी ने बताया सेना का फ्यूचर
COAS Farewell Interview
नई दिल्ली: COAS Farewell Interview: निवर्तमान थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपने कार्यकाल के समापन पर एक विशेष इंटरव्यू में देश की सुरक्षा रणनीति पर बात की. उन्होंने कहा कि भारतीय सेना अग्रिम मोर्चों पर बहु-आयामी युद्ध लड़ने के लिए पूरी तरह सक्षम हो चुकी है. जनरल द्विवेदी ने 'ऑपरेशन सिंदूर' को सैन्य ताकत का नया वैश्विक मानक बताया. उन्होंने सेना के रूपांतरण, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की स्थिति और 'अग्निपथ' योजना के जमीनी नतीजों पर अपना दृष्टिकोण साझा किया.
सवाल: बतौर सेना प्रमुख आप अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि किसे मानते हैं? क्या कोई एजेंडा अधूरा रह गया?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: सफलता हमेशा सामूहिक होती है. हमारा ध्यान सेना के रूपांतरण, संयुक्तता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने पर रहा. सबसे बड़ी उपलब्धि 'ऑपरेशन सिंदूर' है. इसने सेना की संयुक्त और भविष्य के अनुकूल युद्ध लड़ने की क्षमता को प्रमाणित किया. इसने राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे की वास्तविक शक्ति का प्रदर्शन किया. सुरक्षित संचार, साइबर नेटवर्क और सटीक मारक क्षमता का जो अभ्यास हम कर रहे थे, उसे इस ऑपरेशन ने वास्तविक युद्ध क्षेत्र में सफल साबित किया. रूपांतरण एक सतत यात्रा है. कुछ सांगठनिक सुधारों और तकनीकी एकीकरण को जमीन पर उतारने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होती है.
सवाल: 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद सांगठनिक फेरबदल देखे जा रहे हैं. आधुनिकीकरण की क्या स्थिति है और प्राथमिकताएं क्या हैं?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: आधुनिकीकरण अब केवल नए हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है. इसमें रणनीति, सांगठनिक ढांचा, तकनीक और प्रशिक्षण एक साथ काम करते हैं. 'ऑपरेशन सिंदूर' ने साफ कर दिया कि भविष्य के युद्धों में जीत खुफिया जानकारी, सेंसर्स, निशानेबाजों और नेटवर्क को तेजी से जोड़ने पर निर्भर करेगी. इसी उद्देश्य से रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अश्नि ड्रोन प्लाटून और शक्तिबाण रेजिमेंट जैसी विशिष्ट यूनिट्स बनाई गई हैं. वर्तमान प्राथमिकता इन नई प्रणालियों का 'अब्जॉर्प्शन' (पूर्ण अवशोषण) है ताकि सैनिक नेटवर्क के जरिए तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें.
सवाल: नवगठित 'बाज़ बटालियन' (Baaz Battalion) की भूमिका और इसके उद्देश्य क्या हैं?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: 'बाज़ बटालियन' हमारी ड्रोन (RPA) क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में गेम-चेंजर है. इसमें तकनीकी सैन्य विशेषज्ञों का समर्पित पूल तैयार किया जा रहा है जो ड्रोन इकोसिस्टम का प्रबंधन करेंगे. इसका उद्देश्य सर्विलांस (ISR) क्षमताओं को बढ़ाना है ताकि युद्ध क्षेत्र में वास्तविक समय की जानकारी मिले और त्वरित व अचूक कार्रवाई की जा सके.
सवाल: पूर्वी लद्दाख में वार्ताओं के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सुरक्षा की वर्तमान स्थिति क्या है? सेना ने इससे क्या सबक सीखा?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: सबसे बड़ा सबक यही है कि सीमाओं पर स्थिरता के लिए सतर्कता, विश्वसनीय तैयारी और निरंतर संवाद अनिवार्य है. उत्तरी सीमाओं पर स्थिति 'स्थिर लेकिन संवेदनशील' है. डिसइंगेजमेंट समझौतों से जमीन पर तनाव कम हुआ है. सीमा की अलग-अलग समझ से जुड़े स्थानीय मुद्दों को सुलझाने के लिए स्थापित व्यवस्था है और सालाना 1,000 से अधिक जमीनी स्तर की बैठकें व फ्लैग मीटिंग्स होती हैं. हालांकि, स्थिरता का अर्थ ढील देना नहीं है. सेना मजबूत तैनाती बनाए हुए है और बुनियादी ढांचे का विकास लगातार जारी है.
सवाल: आत्मनिर्भरता इकोसिस्टम में सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs), एमएसएमई (MSMEs) और घरेलू स्टार्टअप्स की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: आत्मनिर्भरता भविष्य के युद्धों और राष्ट्रीय सुरक्षा की बुनियादी जरूरत है. संकट के समय हम पूरी तरह बाहरी देशों की आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर नहीं रह सकते. आज हमारे स्वदेशी संचार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सर्विलांस सिस्टम मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. हमने ट्रायल की गति तेज करने और उपकरणों को जल्द शामिल करने के लिए DPSUs, निजी उद्योगों, MSMEs, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों को जोड़ा है. घरेलू इंडस्ट्री को अब लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन फायर्स, स्मार्ट गोला-बारूद और एंटी-ड्रोन तकनीक विकसित करने पर ध्यान देना होगा.
सवाल: सेना का 'अग्निपथ योजना' को लेकर वास्तविक जमीनी आकलन क्या है? क्या इसके 25% रिटेंशन ढांचे में बदलाव की जरूरत है?
जनरल उपेंद्र द्विवेदी: यह सेना को युवा और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने वाला बड़ा सुधार है. फील्ड इकाइयों से अग्निवीरों को लेकर शुरुआती फीडबैक उत्साहजनक है. ये युवा कठिन सैन्य ट्रेनिंग में ढल चुके हैं और आधुनिक संचार व ड्रोन प्रणालियों को सीखने में उनकी क्षमता शानदार है. जहां तक 25% की रिटेंशन सीमा बढ़ाने का सवाल है, योजना अभी विकसित हो रही है और पहले बैच ने चार साल का सेवा चक्र पूरा नहीं किया है. इसलिए निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. हम इसका संस्थागत मूल्यांकन कर रहे हैं. भविष्य में एयर डिफेंस, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे तकनीकी क्षेत्रों की जरूरतों को देखते हुए, यदि आवश्यक हुआ, तो इस पर नीतिगत स्तर पर विचार किया जाएगा.