योग यात्रा

Yoga Journey

Yoga Journey

'योग' परमपिता परमात्मा तक पहुंचने का दिव्य मार्ग है यह परमात्मा से प्रवाहित होकर हम मनुष्यों तक पहुंचा है। भगवान शिव को 'आदियोगी' तथा श्री कृष्ण को 'योगीराज' कहा जाता है। जब हम भगवान शिव का ध्यान करते हैं तो गहन समाधि में निमग्न, असीम शांति देती हुई आदियोगी की छवि ही दिखाई देती है और जब हम श्री कृष्ण का ध्यान करते हैं तो केवल आनंद में मग्न लीलाएं करते आनंद बिखरते परम पुरुष की छवि ही दिखाई देती है जिनको देखने मात्र से हम दुःख से एक क्षण को परे हो जाते हैं।  जहां एक ओर आदियोगी स्वयं किसी परमात्मा की साधना करते दिखाई देते हैं वहीं योग के दिव्य ज्ञान को श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ प्रश्नोत्तर रूप में प्रकट किया, जो ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के रूप में समस्त मानवता का पथप्रदर्शन कर रहा है। जिसमें एक साधारण मनुष्य के मन में उठने वाले सभी प्रश्नों के उत्तर हैं। जब हमारे आराध्य स्वयं साधना में रत रहते हैं तो हम मनुष्यों की तो बात ही क्या है।

    आदियोगी शिव ने मत्स्येंद्र नाथ जी को योग की दीक्षा दी। गुरु मत्स्येंद्र नाथ जी द्वारा होता हुआ हठ योग गुरु गोरखनाथ जी तक पहुंचा। गुरु गोरक्षनाथ, महर्षि पतंजलि और इसके बाद बहुत से ऋषि महर्षि और गुरुओं ने इसे साधारण मनुष्यों के लिए सर्व सुलभ और सर्व ग्राही बनाया। योग की 2 परंपराएं हैं भगवान शिव से हठ योग तथा भगवान विष्णु से राजयोग। एक तीसरा है भक्ति योग जो सभी मनुष्यों के लिये परम सरल है। वे व्यक्ति जिन्हें पूर्व के दोनों योग मार्ग कठिन जान पड़ते हैं वे भक्तिमार्ग के द्वारा परमात्मा तक पहुँच सकते हैं। साधनों के भेद से योग को १ राजयोग अर्थात ध्यान योग ,२ ज्ञानयाेग अर्थात सांख्य योग, 3 कर्म योग अर्थात निष्काम कर्म आनासक्तियोग, ४ भक्ति योग, ५ हठ योग आदि श्रेणियों में विभक्त किया गया है ।
     वस्तुतः ये योग परमात्मा को पाने या यों कहें की परमात्मा तक पहुंचने के मार्ग हैं हमारे सभी ग्रंथों में यही वर्णन मिलता है और हमारे ऋषियों ने इसी यात्रा को पूरी करने के लिए बहुत से ग्रंथ लिख डाले जिन्हें पढ़कर हम वास्तविक स्थिति को जान सकते हैं कि हम इस यात्रा में कहां तक पहुंचे हैं अथवा हम ने स्वयं को कितना सार्थक बनाया है कि हम योग के मार्ग पर चल सके या अभी हम तन और मन से इस यात्रा से बहुत पीछे हैं। इस योग यात्रा की हमने कितनी तैयारी की है। 
 यदि आपको एहसास होता है कि आप सभी के लिए निर्मल हृदय रखते हैं तथा कुछ है आपके आसपास जो हर पल आपकी सहायता करता रहता है तो आप योग के सही मार्ग पर हैं। अन्यथा सर्वप्रथम अपने मन को स्वच्छ और निर्मल कीजिए। यह भक्ति मार्ग है जिसमें आप शनै: शनै:  स्वयं आगे बढ़ते रहते हैं ।

         श्रीमदभगवद्गीता
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।६.३०।।

भावार्थ: जो साधक मुझे सर्वत्र देखता है और सम्पूर्ण जगत को मुझमें देखता है, वह मुझसे कभी अलग नहीं होता और मैं उससे कभी अलग नहीं होता।

     योग का बहुत प्रचलित मार्ग है 'हठ योग'। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि हठपूर्वक इस मार्ग पर चल पड़ना। कठिन साधना के द्वारा योग को प्राप्त हो जाना।          घेरंड संहिता में 'महर्षि घेरंड' ने हठयोग के 7 अंगों (साधनों) का वर्णन किया है, जिसे 'सप्तांग योग' या 'घटस्थ योग' कहा जाता है। 

   ये सात अंग निम्नलिखित हैं:

षट्कर्म (शोधन): शरीर को शुद्ध और रोगमुक्त करने के लिए 6 क्रियाएं (धौती, बस्ती, नेति, त्राटक, नौली और कपालभाति)।
आसन (दृढ़ता): शरीर को मजबूती और स्थिरता प्रदान करने वाले विभिन्न शारीरिक अभ्यास।
मुद्रा (स्थिरता): मन की स्थिरता और ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करने वाली मुद्राएं।
प्रत्याहार (धैर्य): इंद्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ना। 
प्राणायाम (लाघव - हल्कापन): श्वास-प्रश्वास के नियंत्रण द्वारा प्राण ऊर्जा को बढ़ाना। 
ध्यान (प्रत्यक्ष): मन को एकाग्र करके ईश्वर या आत्मा का साक्षात्कार करना।
समाधि (निर्लिप्तता): परम अवस्था की प्राप्ति, जहाँ साधक सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है।
      महर्षि घेरंड के अनुसार, इन 7 अंगों के निरंतर अभ्यास से साधक का शरीर, मन और आत्मा परिपक्व होकर मोक्ष प्राप्त करने योग्य बन जाते हैं।

महर्षि पतंजलि के 'योगसूत्र' में योग के आठ अंग बताए गए है। ये आठ अंग निम्नलिखित हैं:

यम: नैतिक और सामाजिक अनुशासन (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)।
नियम: व्यक्तिगत और आंतरिक अनुशासन (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान)।
आसन: शारीरिक स्थिरता और स्वास्थ्य के लिए विभिन्न शारीरिक मुद्राएं।
प्राणायाम: श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करने की श्वास प्रक्रिया।
प्रत्याहार: इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ना।
धारणा: मन को किसी एक वस्तु या विचार पर केंद्रित करना (एकाग्रता)। 
ध्यान: बिना किसी व्यवधान के निरंतर मन को शांत और केंद्रित रखना।
समाधि: ध्यान की सर्वोच्च अवस्था, जहाँ साधक और ईश्वर (परमात्मा) एक हो जाते हैं।

      योग के साधक इन अंगों के परिचय द्वारा स्वयं को जान सकते हैं कि वह अभी किस स्थिति में है और किस स्थिति तक उन्हें पहुंचना है। योग केवल शरीर को स्वस्थ बनाना ही नहीं है वरन् स्वयं को ईश्वर में एकाकार कर लेना, आत्मा को उस परमात्मा में लीन करना ही वास्तविक 'योग' है। यह वह स्थिति है जहां 'मैं' शेष नहीं रहता सब 'ईश्वर’ हो जाता है।
                                                   –सपना 'अनुश्री'