सभी के लिए सुलभ हो न्यायपालिका, सीजेआई बोले-लोकतंत्र में यही है जवाबदेही की अंतिम कड़ी

Supreme Court Chief Justice

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नई दिल्ली: Supreme Court Chief Justice: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि, संस्थानों में लोगों का भरोसा कभी भी अपने आप नहीं बनता, बल्कि इसे पारदर्शी स्थिरता और खुद को सही करने की हिम्मत से कमाया जाना चाहिए.

संविधान और न्यायपालिका पर बात करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक ताकत यह दिखाने में नहीं है कि वह गलत नहीं है, बल्कि सीखने और जवाबदेही के लिए तैयार रहने में है.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 5 जून को लंदन की क्वीन मैरी विश्वविद्यालय का दौरा किया, जहां उन्होंने सेंटर फॉर कमर्शियल लॉ के एक कार्यक्रम में सैकड़ों छात्रों को 'ग्लोबल कॉन्स्टिट्यूशनल ज्यूरिस्प्रूडेंस' (वैश्विक संवैधानिक न्यायशास्त्र) में भारतीय अदालतों का योगदान थीम पर संबोधित किया. छात्रों ने न्यायपालिका, न्याय तक पहुंच, कानूनी शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों और कानूनी पेशा के भविष्य पर कई तरह के सवाल पूछे.

भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर उनसे पूछा गया कि वह संवैधानिक लोकतंत्र में लोगों का भरोसा बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका को कैसे देखते हैं. सीजेआई ने कहा कि लोगों का भरोसा कभी भी किसी संस्थान को यूं ही नहीं मिल जाता और यह पारदर्शिता, स्थिरता और खुद को सही करने की हिम्मत से लगातार कमाया जाता है. उन्होंने कहा, "मैंने खुले तौर पर कहा है कि न्यायपालिक की ताकत इस बात से नहीं आती कि वह गलत नहीं है.

उन्होंने कहा, "संस्थाएं तब और मजबूत होती हैं जब वे सीखने और सुधार के लिए खुली रहती हैं. एक संवैधानिक लोकतंत्र में, न्यायपालिका जवाबदेही की आखिरी लाइन होती है, लेकिन उसे खुद संविधान और उन लोगों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए जिनकी वह सेवा करती है…"

यह पूछा गया कि उनके हिसाब से आधुनिक लोकतंत्र में न्यायपालिका की सबसे जरूरी भूमिका क्या है. सीजेआई ने कहा, "मैं कहूंगा कि ज्यूडिशियरी का सबसे पहला काम यह पक्का करना है कि संविधान में लिखे सिद्धांत सिर्फ कागज पर लिखे शब्द न हों, बल्कि हर नागरिक की आजादी को बनाए रखने वाली जीती-जागती गारंटी हों."

उन्होंने आगे कहा, "इसी तरह, न्यायपालिका को झगड़े के समय एक स्थिर करने वाली ताकत के तौर पर काम करना चाहिए, सामाजिक बदलाव की तेजी और संवैधानिक नैतिकता के हमेशा रहने वाले मूल्यों के बीच संतुलन बनाना चाहिए. "लेकिन मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगा जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और जो पहले दिन से ही मेरे निजी एजेंडे में रही है, कि न्यायपालिका को न सिर्फ अधिकारों का गार्डियन होना चाहिए, बल्कि उसे इतना सुलभ भी होना चाहिए कि वह गार्डियनशिप असली हो. एक कोर्ट जो सिर्फ उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है जो केस कर सकते हैं, वह अपना संवैधानिक काम पूरा नहीं कर रहा है. वह सिर्फ उसे निभा रहा है."

जब उनसे पूछा गया कि उनके लिए निजी तौर पर न्याय का क्या मतलब है. सीजेआई सूर्यकांत ने जवाब दिया, "न्याय क्या है.. क्या यह बदला है. आंख के बदले आंख. क्या यह कानूनी नियमों को ठीक वैसे ही लागू करना है जैसे वे कानून की किताबों में दिखते हैं. या यह कुछ ज्यादा बारीक है, जैसा कि अक्सर राजा सोलोमन के फैसले से जुड़ी समझदारी होती है, जहां कानून को इंसानी हकीकतों की समझ के साथ लागू किया जाता है.

उन्होंने कहा, "मेरे हिसाब से, न्याय इन दोनों के बीच कहीं होता है. जबकि कानून को एक उद्देश्य रूपरेखा देना चाहिए जिसके अंदर कोर्ट काम करते हैं, कोई भी दो केस कभी भी पूरी तरह से एक जैसे नहीं होते. हर झगड़ा कोर्ट के सामने अपने खास तथ्य, हालात और इंसानी नतीजों के साथ आता है. इसलिए, एक जज का रोल सिर्फ कानूनी सिद्धांत को अमूर्त रूप में लागू करना नहीं है, बल्कि उन्हें इस तरह से व्याख्या करें और लागू करना है जो मौजूदा केस की असलियत के हिसाब से हो."

न्यायिक फैसले पर सीजेआई ने आगे कहा कि, एक जज को कानून से जुड़े रहना चाहिए, साथ ही कानून जितनी इजाजत देता है, उतनी समझदारी से काम लेना चाहिए. चुनौती स्थिरता और लचीलापन के बीच, सिद्धांत और व्यावहारिकता के बीच, निष्पक्षतावाद और हर केस में जरूरी तौर पर आने वाली इंसानी बातों के बीच सही संतुलन बनाने में है. मेरे लिए, यही न्याय का सार है.

वस्तुनिष्ठता और व्यक्तिपरकता के बीच की बारीक लाइन पर चलने की काबिलियत है. कानून के प्रति वफादार रहते हुए यह पक्का करना कि कोर्ट के सामने खास हालात में इसका इस्तेमाल निष्पक्षता के मकसद को पूरा करे." उन्होंने कहा कि उनके हिसाब से एक अच्छा जज वह है जो समझता है कि संतुलन कहां है और उसे बनाए रखने की समझ रखता है.