सस्ती तकनीक और हर नागरिक तक पहुंच: AI में आत्मनिर्भर भारत की तैयारी
Preparing for a Self-Reliant India in AI
लेखक : श्री सुशील पाल, संयुक्त सचिव , इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय
Preparing for a Self-Reliant India in AI: कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आज की सबसे ताकतवर और तेजी से बदलने वाली तकनीक में से एक बनती जा रही है। इसमें यह क्षमता है कि यह देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे, उत्पादन बढ़ाए और विकास की रफ्तार तेज करे। सरकारी सेवाओं को ज्यादा प्रभावी और पारदर्शी बनाने में भी एआई अहम भूमिका निभा सकती है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बीमारी की शुरुआती पहचान, खेती में सही समय पर सही फैसले लेने, आपदा से पहले चेतावनी देने, मौसम और जलवायु का बेहतर अनुमान लगाने और सरकारी योजनाओं का लाभ आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने में एआई पहले से ही मदद कर रही है। आने वाले समय में शिक्षा, परिवहन और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने की संभावना है।
लेकिन जैसे पहले की तकनीकी क्रांतियों में हुआ, वैसे ही एआई के साथ भी असमानता की तस्वीर सामने आती है। जिनके पास कंप्यूटर की ताकत यानी कंप्यूट, अच्छा डेटा और मजबूत डिजिटल ढांचा है, वही बड़े स्तर पर एआई का लाभ उठा पा रहे हैं। जिनके पास ये सुविधाएं नहीं हैं, वे पीछे रह जाते हैं। यह फर्क आज केवल कंपनियों के बीच ही नहीं, बल्कि देशों और इलाकों के बीच भी साफ दिखाई देता है।
भारत ने इस चुनौती को एक अवसर के रूप में लिया है। इंडिया एआई मिशन के जरिए भारत यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि एआई की ताकत कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित न रहे। कंप्यूट, डेटा और एआई मॉडल को डिजिटल सार्वजनिक सुविधा के रूप में देखा जा रहा है, ताकि स्टार्टअप, शोधकर्ता, छात्र और छोटे संस्थान भी एआई पर काम कर सकें। भारत की सोच साफ है- ऐसा डिजिटल ढांचा बनाया जाए जो खुला हो, आसानी से बढ़ सके और समाज के हर वर्ग के काम आए। इससे एआई का लाभ आम लोगों तक पहुंचे, देश में ही नवाचार को बढ़ावा मिले और तकनीक के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर बन सके।
इस सोच के पीछे एक ठोस योजना है। दावोस में हुए विश्व आर्थिक मंच में केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि भारत एआई को पांच स्तरों पर विकसित कर रहा है- बिजली और ऊर्जा, कंप्यूट और इंफ्रास्ट्रक्चर, चिप और हार्डवेयर, एआई मॉडल और एप्लिकेशन। इन सभी पर एक साथ काम होने से ही एआई का सही और व्यापक उपयोग संभव हो पाएगा।
भारत का तरीका इसलिए अलग है क्योंकि यहां एआई तक पहुंच आसान बनाई गई है। भारत ने एक साझा कंप्यूट प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जहां 38,000 जीपीयू एक ही पोर्टल पर मिलते हैं। इनका खर्च करीब 65 रुपये प्रति घंटा है, जबकि दूसरे देशों में इसके लिए 2.5 से 3 डॉलर प्रति घंटा तक देने पड़ते हैं। इंडिया एआई मिशन के तहत सरकार एआई मॉडल बनाने के लिए पूरी लागत (100%) तक मदद दे रही है और एआई के इस्तेमाल पर भी 40 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। इससे पैसे की कमी एआई पर काम करने में रुकावट नहीं बनती। इसी वजह से सरवम एआई, सोकेट एआई और ज्ञानि एआई जैसे भारतीय स्टार्टअप अब बिना बड़ी पूंजी लगाए अपने खुद के एआई और भाषा मॉडल बना पा रहे हैं, जो पहले सिर्फ बड़ी विदेशी कंपनियां ही कर पाती थीं।
भारत का लक्ष्य सिर्फ एआई का इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि अपना एआई बनाना है। भारत अपना खुद का एआई मॉडल तैयार कर रहा है, जो भारतीय भाषाओं, भारतीय संस्कृति और भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया जाएगा। इसे इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट (16–20 फरवरी 2026) में पेश किए जाने की उम्मीद है। यह मॉडल भारत के ही डेटा पर प्रशिक्षित होगा और देश के भीतर ही काम करेगा।
इससे एआई ज्यादा सटीक, निष्पक्ष और सबको साथ लेकर चलने वाला बनेगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित होगा कि डेटा सुरक्षित रहे और एआई का इस्तेमाल देश के कानूनों और नागरिकों के अधिकारों के अनुसार हो।
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में एआई को लेकर केवल जोखिमों की चर्चा नहीं होगी, बल्कि यह देखा जाएगा कि एआई जमीन पर क्या बदलाव ला रही है। इसमें एआई को सबके लिए उपलब्ध कराने, विकास में इसके उपयोग, पर्यावरण की रक्षा, भरोसेमंद सिस्टम, भारतीय भाषाओं में एआई, ग्लोबल साउथ की भागीदारी और एआई से जुड़ी असमानताओं को कम करने जैसे मुद्दों पर विचार किया जाएगा।
भारत का यह तरीका उन देशों के लिए भी एक उदाहरण है, जो अभी विकास के रास्ते पर हैं। यह दिखाता है कि खुलेपन और नवाचार के साथ-साथ अपनी तकनीकी स्वतंत्रता कैसे बनाए रखी जा सकती है। भारत अपने एआई मॉडल ओपन-सोर्स के रूप में विकसित कर रहा है, ताकि दूसरे देश भी अपनी जरूरतों के अनुसार इन्हें अपना सकें। मकसद है मिलकर आगे बढ़ना, बिना किसी नई निर्भरता के।
आज जब एआई देश की ताकत और अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुकी है, सवाल यह नहीं रह गया है कि एआई अपनाया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि इसे समझदारी, जिम्मेदारी और टिकाऊ तरीके से कैसे अपनाया जाए।
(लेखक इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं |)