ब्रिक्स अध्यक्ष भारत: सम्मान नहीं, कड़ी अग्निपरीक्षा

BRICS Chairmanship for India

BRICS Chairmanship for India

प्रधानमंत्री मोदी का स्पष्ट संदेश : दुनिया को संघर्ष नहीं, समाधान चाहिए    

BRICS Chairmanship for India: ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता भारत को मिलना एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है, लेकिन इसके साथ ही यह जिम्मेदारी और चुनौतियों का भी दौर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने जिस तरह वैश्विक मंचों पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है, ब्रिक्स की अध्यक्षता उसी मोदी विज़न को आगे बढ़ाने का अवसर भी है और उसकी परीक्षा भी। आज दुनिया भारत को उम्मीद भरी नज़रों से देख रही है, लेकिन रास्ता आसान नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी का स्पष्ट संदेश रहा है कि दुनिया को संघर्ष नहीं, समाधान चाहिए। भारत ने जी-20 से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक यही दृष्टिकोण रखा है। ब्रिक्स के मंच पर भी भारत इसी सोच के साथ आगे बढ़ सकता है—ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनकर, विकासशील देशों की वास्तविक समस्याओं को एजेंडे के केंद्र में रखकर। विकास वित्त, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दे मोदी विज़न के प्रमुख स्तंभ हैं।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ब्रिक्स के भीतर आंतरिक मतभेद हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास कोई छिपी बात नहीं है। ऐसे में मंच को टकराव का अखाड़ा बनने से बचाना और सहयोग का माध्यम बनाए रखना भारत के लिए कठिन संतुलन होगा। साथ ही, रूस-पश्चिम तनाव और उसके ब्रिक्स पर पड़ने वाले प्रभाव भी भारत की कूटनीति की परीक्षा लेंगे।

दूसरी बड़ी चुनौती है ब्रिक्स का तेज़ी से बढ़ता दायरा। नए देशों की सदस्यता ने समूह को व्यापक तो बनाया है, लेकिन एकजुटता को कमजोर करने का जोखिम भी बढ़ाया है। अलग-अलग आर्थिक हित, राजनीतिक सोच और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के बीच साझा एजेंडा तय करना आसान नहीं होगा। भारत को यहां सहमति बनाने की अपनी पारंपरिक क्षमता का उपयोग करना पड़ेगा।

आर्थिक मोर्चे पर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। न्यू डेवलपमेंट बैंक से बड़े-बड़े वादे जुड़े हैं, लेकिन ज़मीनी असर अभी सीमित है। भारत के सामने चुनौती होगी कि वह इस संस्था को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और विकासोन्मुख बनाए, ताकि ब्रिक्स सिर्फ घोषणाओं का मंच न रह जाए।

इसके साथ ही, पश्चिमी देशों की यह आशंका भी एक चुनौती है कि ब्रिक्स कहीं मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होने वाला गुट न बन जाए। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति का संतुलन यहीं काम आएगा—जहाँ भारत ब्रिक्स को मज़बूत करते हुए भी यह संदेश दे सके कि वह सहयोग का पक्षधर है, टकराव का नहीं।

कुल मिलाकर, ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए सम्मान के साथ-साथ कठिन नेतृत्व परीक्षा है। मोदी विज़न के अनुरूप यदि भारत संवाद, संतुलन और विकास को केंद्र में रखता है, तो वह इन चुनौतियों को अवसर में बदल सकता है। तभी ब्रिक्स भारत के नेतृत्व में एक ऐसा मंच बन पाएगा, जो न केवल विकासशील देशों की उम्मीदों पर खरा उतरे, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी सकारात्मक बदलाव का माध्यम बने।

BRICS Chairmanship for India
दिनेश दिक्षित
राजनीतिक विश्लेषक