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विदेश और रक्षा मोर्चे पर भारत चाक चौबंद

यह सच है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भारत के समक्ष विदेश नीति की चुनौतियां गंभीर हुई हैं, अब दुनिया के देश इसकी पहचान कर रहे हैं कि वे भारत के साथ खड़े होंगे या फिर भारत से दूर। आजादी के बाद से भारत की विदेश नीति इतनी आक्रामक कभी नहीं रही, हालांकि माना यह जाता रहा है कि एक उबरते देश के लिये दुनिया के ताकतवर देशों के मुताबिक चलने में ही भलाई होती है। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

मोदी सरकार ने उन मसलों को जोकि सदियों से ठंडे बस्ते में बंद थे, बाहर निकाल कर जहां देश के अंदर बदलाव की बयार पैदा की है, वहीं दुनिया के दूसरे देशों को भी इसका अहसास कराया है कि अब भारत के प्रति उनका नजरिया बदलना ही चाहिए। विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत के बयान इस दिशा में काफी अहम समझे जा सकते हैं। विदेश मंत्री ने कहा है कि दशकों से चली आ रही समस्याओं को अगली पीढ़ी के भरोसे छोडऩे के बजाय उनका हल किया जाना जरूरी है।

अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन कानून ऐसे कदम हैं जिन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा है। पाकिस्तान जिस आधार पर भारत के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर पर दावा जताता आया है, उसे देश की संसद ने खत्म करके जहां पाकिस्तान के फर्जी दावे की हवा निकाली है, वहीं उसके मित्र देशों को भी यह बताया है कि भारत के आंतरिक मामलों में उनका दखल स्वीकार्य नहीं है।

पाकिस्तान ने इस मसले पर दुनिया भर के देशों के सामने अपना दुखड़ा रोया है, उसकी दलील है कि भारत ने गलत किया। लेकिन भारत सरकार ने सदियों से उलझे एक मसले का समाधान निकाल कर यही संदेश दिया है कि अब मौजूदा सरकार भावी दौर के लिए कुछ भी नहीं छोड़ेगी। हालांकि सवाल यह है कि ऐसे अवसर दूसरे राजनीतिक दलों और उनकी सरकारों के पास भी थे, लेकिन क्या उन्होंने इन पर काम किया। मोदी सरकार का यह निश्चय तारीफ के काबिल है कि कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून जैसे मुद्दे भारत अपने नजरिए से ही सुलझाएगा। मालूम हो, नागरिकता संशोधन कानून पर भी पाकिस्तान समेत दूसरे देशों ने सवाल उठाए हैं। हालांकि यह बात दीगर है कि ऐसे देशों में खुद लोकतांत्रिक मूल्य बलि चढ़ चुके हैं।

एक संप्रभुता संपन्न देश का अभिप्राय यही है कि वह न केवल अपने फैसले खुद ले बल्कि ऐसे फैसले लेता हुआ दिखाई भी दे। उधर विपक्ष अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध जिस प्रकार सरकार की आलोचना कर रहा है वह देश के अंदर वैचारिक लोकतंत्र होने का सबूत है। लेकिन इस विरोध को भारत विरोधी देश अपने हितों के पक्ष में हवा दे रहे हैं। वास्तव में विपक्ष में कोई भी दल रहा हो वह सत्ता पक्ष को हर मुद्दे पर जोरशोर से घेरने की ही ताक में रहता आया है. देश की संप्रभुता और अखंडता की खातिर विपक्ष को रचनात्मक दायरे में रहकर अपना विरोध जताना चाहिए।

भारतीय विदेश नीति के बाद रक्षा क्षेत्र में भी जो परिवर्तन देखने को मिले हैं, संभव है इससे देश की रक्षा जरूरतें पूरी करने में और मजबूती आएगी। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के तौर पर अब तीनों सेनाओं में जो सामंजस्य बढ़ता नजर आ रहा है। गौरतलब है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने आतंकवाद के खात्मे के लिए वैसा ही रवैया अपनाने की जरूरत बताई है, जैसा अमेरिका ने 9/11 हमले के बाद किया था। उनका कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई खत्म नहीं हो रही है। यह ऐसी चीज है जो लगातार रहेगी, हमें इसके साथ तब तक रहना होगा जब तक की हम इसे समझ न जाएं और आतंकवाद की जड़ों तक न पहुंचे।

वास्तव में विदेश और रक्षा के मोर्चे पर भारत सरकार की कोशिशें रंग ला रही हैं, एक शक्तिशाली देश होने का अभिप्राय यही नहीं है कि आर्थिक मोर्चे पर ही प्रगति हो, चीन जैसे देश जोकि भारत के प्रति घोर प्रतिस्पर्धा रखते हैं, अगर आर्थिक मोर्चे के अलावा रक्षा क्षेत्र में भी उसे भारत की ओर से चुनौती हासिल हो रही है तो यह भारत की तरक्की का ही सबूत है। अभी चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। यह घटनाक्रम अगले दो दशक में अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भारत के चीन की बराबरी पर आने के संकेत हैं। नए दौर में अमेरिका से भारत के रिश्ते बेहतरीन हुए हैं, वहीं फ्रंास, ब्रिटेन और रूस जैसे देश भी भारत का लोहा स्वीकार कर चुके हैं।

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