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घाटी में प्रतिबधों पर अदालती रुख के निहितार्थ

जब अमेरिका समेत 16 देशों के राजनयिक अपने परिवारों के साथ जम्मू-कश्मीर के दौरे पर हैं, तब सुप्रीम कोर्ट की ओर से राज्य में धारा 144 समेत अन्य पाबंदियों पर फैसला देते हुए इसकी समीक्षा के आदेश देना निश्चित रूप से केंद्र सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद यहां लगाई गई पाबंदियों को लेकर देशभर में विपक्ष केंद्र सरकार पर बरसता रहा है। कांग्रेस समेत विपक्ष के कई नेताओं को घाटी का दौरा तक नहीं करने दिया गया जबकि उसी केंद्र के न्योते पर बाहरी देशों के राजनयिक घाटी के माहौल को जांच-परख रहे हैं। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में अनेक याचिकाएं दायर की गई थी, जिन पर माननीय अदालत ने शुक्रवार को फैसला दे दिया।

देश की शीर्ष अदालत ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर सरकार एक सप्ताह के भीतर सभी आदेशों की समीक्षा करे। वहीं अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल किया जाए। कोर्ट ने अपने आदेश में जो अहम बात कही है, और जोकि पूरे देश में एक नजीर की भांति देखी जाएगी वह यह है कि किसी विचार को दबाने के लिए धारा 144 सीआरपीसी (निषेधाज्ञा) का इस्तेमाल उपकरण के तौर पर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कश्मीर में बहुत हिंसा हुई है। हम सुरक्षा के मुद्दे के साथ मानवाधिकारों और स्वतंत्रता को संतुलित करने की पूरी कोशिश करेंगे। इंटरनेट पर एक समयसीमा तक ही रोक लगना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में बोलने की स्वतंत्रता अनिवार्य तत्व है। इंटरनेट का उपयोग करने का अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत एक मौलिक अधिकार है।

आजकल जब नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देशभर में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, और सरकार को दंगाइयों की रोकथाम के लिए धारा 144 और इंटरनेट पर प्रतिबंध जैसे उपाय भी करने पड़ रहे हैं, तब इस फैसले का आना काफी बातें स्पष्ट करता है। सरकार और प्रशासन के समक्ष यह चुनौती है कि वह हिंसा को रोके लेकिन दूसरी तरफ नागरिकों की वैचारिक स्वतंत्रता का भी उसे ख्याल रखना होगा। हालांकि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का ऐसा हनन कांग्रेस के शासनकाल में भी कई बार होता आया है। आपातकाल ऐसा ही वक्त था जब जन सामान्य से लेकर बड़े बड़े धुरंधर नेताओं को महीनो तक सलाखों के पीछे कैद रखा गया और निरंकुश शासन के जरिये उनकी जुबान बंद रखी गयी।

भाजपा की सरकार का दवा है कि उसका मकसद घाटी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति जताने वाले किसी विचार को दबाने का नहीं, माहौल जैसे जैसे सुधरेगा वैसे ही प्रतिबंध में ढील दे दी जाएगी। मीडिआ रिपोर्टों के अनुसार घाटी के दौरे पर गए विदेशी राजनयिक दल ने केंद्र सरकार की इस बात के लिए प्रशंसा की है कि राज्य में रक्तपात और दमन के बगैर केंद्र ने स्थिति को संभाला है। पिछले कुछ समय से विपक्ष द्वारा केंद्र सरकार की निरंतर नकारात्मक आलोचना का फायदा पाकिस्तान ने उठाया था। विपक्षी नेताओं को घाटी में जाने से रोके जाने के घटनाक्रम को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में इस तरह से पेश किया था कि भारत ने घाटी में किस प्रकार नागरिकों के अधिकार छीने हैं। अब कोर्ट के फैसले को भी अगर पाकिस्तान अपने फायदे के लिए इस्तेमाल न करे तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।

गौरतलब है कि घाटी में लगाए गए प्रतिबंधों को केंद्र सरकार ने कोर्ट के समक्ष सही ठहराया था। केंद्र ने कहा था कि सरकार के एहतियाती उपायों की वजह से ही राज्य में किसी व्यक्ति की न तो जान गई और न ही एक भी गोली चलानी पड़ी। सरकार का तर्क था कि घाटी में अगर सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाती तो यह मूर्खता होती। केंद्र सरकार की यह दलीलें अपनी जगह सही है।प्रतिबन्ध अगर पहले ही हटा लिए जाते तोसंभव है कि हालात बिगडऩे के बाद लोग फिर अदालत में पहुंचते और अदालत सरकार को सुरक्षा उपाय न करने पर लताड़ लगाती। आज के समय में इंटरनेट अभिव्यक्ति की आवाज का प्रखर माध्यम बन गया है, सूचनाओं के आदान-प्रदान के अलावा यह जानकारी प्रदाता भी है। घाटी में इसके प्रयोग पर प्रतिबंध के पीछे सरकार की मंशा पाकिस्तान प्रायोजित दुष्प्रचार की कमर तोडऩा भी थी। अब कांग्रेस का कहना है कि कोर्ट ने इंटरनेट के महत्व को मौलिक अधिकार बताकर मोदी सरकार की अवैध गतिविधियों को बड़ा झटका दिया है।

कांग्रेस और विपक्ष का यह रवैया कुछ हद तक अनुचित जान पड़ता है। दुश्मन देश के हमले, आतंकी गतिविधियों और दंगा-फसाद की स्थिति में सरकार अगर बचाव के कदम उठाती है तो ये भी दमनकारी ठहराए जाएंगे, इसकी आड़ में दुश्मन अगर अपने मंसूबे पूरे करेंगे तो उनकी रोकथाम किसकी जिम्मेदारी होगी । विपक्ष को आलोचना का अधिकार है, लेकिन यह तार्किक होनी चाहिए।

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