Government survives in Himachal

Editorial:हिमाचल में सरकार बची, पर लोकतांत्रिक मान्यताएं बिखरी

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Government survives in Himachal

हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में छह कांग्रेस विधायकों की क्रॉस वोटिंग का मामला अपने आप में ऐतिहासिक है। कांग्रेस के पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद जिस प्रकार पार्टी के छह विधायकों ने यह कदम उठाया वह अचंभित करने वाला भी है। यह जानते हुए कि ऐसा करने के बाद क्या परिणाम सामने आ सकते हैं, पार्टी विधायकों ने व्हीप के बावजूद अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता को हरवा दिया। निश्चित रूप से इस प्रकरण में राज्य कांग्रेस इकाई और सरकार के बीच समन्वय के अभाव के प्रकट दर्शन हुए हैं। इन हालात के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की ओर से त्यागपत्र की पेशकश भी की गई लेकिन पार्टी के वरिष्ठ पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में जिस प्रकार इस मामले को फिलहाल के लिए शांत किया गया है, वह अच्छा ही है।

हालांकि संभव है, यह मामला इतनी जल्दी ठंडा नहीं होगा, क्योंकि जिन छह विधायकों की सदस्यता विधानसभा अध्यक्ष ने रद्द की है, वे अब अदालत का दरवाजा खटखटाने जा रहे हैं। उनका दावा भी है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है और नियमों का उल्लंघन भी नहीं किया है। उनके इस दावे की सच्चाई अदालत के समक्ष क्या रहती है, यह तो भविष्य में तय होगा, लेकिन कांग्रेस के कुल 40 विधायकों में से छह की सदस्यता रद्द होने के बाद भी पार्टी के पास बहुमत का आंकड़ा है।

बेशक, यह जांच का विषय है और चर्चा की बात भी कि आखिर छह पूर्व कांग्रेस विधायकों को ऐसा क्या प्रलोभन मिला या फिर ऐसा क्या प्रस्ताव उन्हें दिया गया कि उन्होंने विपक्षी दल के उम्मीदवार को वोट दिया। हालांकि इस प्रकरण से राज्य सरकार के प्रति असंतोष की प्रतिछाया भी नजर आई है। अब यही वजह है कि मतभेद सुलझाने के लिए समन्वय समिति गठित की गई है। लेकिन यह पार्टी के सभी नेताओं के लिए सबक है कि उन छह पूर्व विधायकों के प्रति ऐसा क्या रवैया रहा, जिसकी वजह से उन्होंने पाला बदला। मुख्यमंत्री सुक्खू सरकार को अभी कोई हानि होने का अंदेशा नहीं है। अगर विपक्षी भाजपा सदन में अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई भी तो सरकार के पास बहुमत की वजह से उसे नुकसान नहीं होगा।

हालांकि प्रश्न यह भी है कि बाकी विधायकों में और कितने ऐसे छह पूर्व विधायक हो सकते हैं, जोकि पाला बदलने को तैयार हों। राज्य में कांग्रेस के पर्याप्त बागी विधायकों की संख्या भी इतनी नहीं है कि महाराष्ट्र की तर्ज पर अलग पार्टी बनाकर विपक्ष के साथ बैठकर सरकार बना लें। संभव है, प्रदेश कांग्रेस की ओर से इसलिए कहा जा रहा है कि भाजपा का ऑपरेशन विफल हो गया। हालांकि इस प्रकरण ने प्रदेश के भाजपा नेताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाया है कि आखिर उनका मकसद राज्यसभा चुनाव जीतना था, या फिर कांग्रेस की सरकार गिराने की कोशिश करना। चंडीगढ़ में मेयर पद के चुनाव में जिस प्रकार से मामला विवादित हुआ और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, उसके बावजूद चुनाव के दौरान ऐेसे दांवपेच पार्टी को सोचने को मजबूर नहीं कर रहे हैं। क्या यह आवश्यक नहीं है कि अपने चाल,चरित्र और चेहरे को बचाकर रखा जाए।

इस प्रकरण के बाद राज्य कांग्रेस ने भारी कीमत अदा की है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराकर चुनाव जीता था। हालांकि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की हार और उसके छह विधायकों की सदस्यता जाना अपने आप में बहुत बड़ा नुकसान है। विधानसभा अध्यक्ष की ओर से भी कांग्रेस के छह विधायकों की सदस्यता रद्द करने में ज्यादा वक्त नहीं लिया गया। इसके पीछे भी कोई राजनीतिक वजह ही रही होगी। सदस्यता रद्द होने के बाद पूर्व विधायकों का आरोप है कि उन्हें उचित समय नहीं दिया गया। क्या यह पहले से तय था कि ऐसा करके कांग्रेस के समक्ष और चुनौती पैदा की जाए। संभव है, कांग्रेस के और भी विधायकों ने ऐसे बागी तेवर अपनाए होते तो सुक्खू सरकार पर संकट और गहरा जाता। लेकिन इस संकट को हाल फिलहाल के लिए यहीं रोक लिया गया तो यह पार्टी के रणनीतिकारों की कोशिशों का सफल होना है। लेकिन इतना तय है कि जिन पूर्व विधायकों ने पाला बदला, उनके मन में सरकार के प्रति गहरी नाराजगी रही होगी। क्या उस नाराजगी को समय रहते समझने और उसके समाधान की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी।

वास्तव में नए दौर में सत्ता की प्राप्ति के तरीकों पर सवाल नहीं रह गया है, अब तो बस जिसके पास सामथ्र्य है, वही सत्ताधिकारी है। लोकतंत्र में नीति और नियम तिरोहित हो रहे हैं, लेकिन इन्हें संभालने की कोशिश नहीं हो रही। क्या राजनीतिक दलों को इस जिम्मेदारी को नहीं समझना चाहिए? प्रदेश में बेशक सरकार तो बच गई लेकिन इतना तय है कि लोकतांत्रिक परंपराओं को स्थायी नुकसान पहुंचा है। 

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