बदली सोच, पहले पढ़ाई फिर विदाई: हिमाचल में लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ी, बाल विवाह में आई बड़ी कमी
Changing Mindsets—Education Before Marriage
शिमला। Changing Mindsets—Education Before Marriage, पहाड़ की बेटियों ने समय के साथ सोच बदल पहचान बनाई है। आज उनकी पहचान डिग्रियों और करियर से हो रही है। केंद्र सरकार के सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्ट ने हिमाचल के सामाजिक बदलाव पर मुहर लगा दी है। पहले जहां बेटियों का बाल विवाह कर दिया जाता था, जोकि अब बीते दिनों की बात हो गई है और बेटियां 21 की उम्र पार कर अपने पैरों पर खड़े होकर ही ससुराल जा रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 86.2 प्रतिशत बेटियों की शादी 21 वर्ष या उससे अधिक आयु में हो रही है। औसत प्रभावी विवाह आयु 24.7 वर्ष तक पहुंच गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह बढ़कर 25.2 वर्ष दर्ज की गई। यह राष्ट्रीय औसत 23.1 वर्ष से काफी अधिक है और सामाजिक बदलाव की नई तस्वीर पेश करता है।
केवल जम्मू कश्मीर हिमाचल से आगे
हिमाचल देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है, जहां बेटियां कम उम्र में विवाह करने की जगह पहले पढ़ाई और करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। 21 वर्ष या उससे अधिक आयु में विवाह करने वाली बेटियों के मामले में केवल जम्मू-कश्मीर (89.4 प्रतिशत) हिमाचल से आगे है। इसके बाद हरियाणा (85.9 प्रतिशत) और दिल्ली (85 प्रतिशत) का स्थान है। राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 73.5 प्रतिशत है, जबकि हिमाचल में यह 86.2 प्रतिशत दर्ज किया गया है। यानी प्रदेश राष्ट्रीय औसत से करीब 13 प्रतिशत अंक आगे है।
0.4 प्रतिशत बाल विवाह के मामले
सबसे सकारात्मक पहल बाल विवाह के मामलों में आई भारी गिरावट है। हिमाचल में केवल 0.4 प्रतिशत बेटियों का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में दर्ज किया गया। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा शून्य प्रतिशत है। शहरों में 18 वर्ष से कम आयु की किसी भी बेटी का विवाह दर्ज नहीं हुआ। इसके विपरीत बंगाल में 2.1 प्रतिशत और झारखंड में 2.8 प्रतिशत बेटियों की शादी 18 वर्ष से पहले हुई।
कैसे आया बदलाव
इसके पीछे की वजह प्रदेश में शिक्षा का बढ़ता स्तर, लड़कियों की उच्च शिक्षा में बढ़ती भागीदारी, सरकारी योजनाओं का प्रभाव और रोजगार के नए अवसर बदलाव के प्रमुख कारण हैं। पहले जहां पहाड़ी क्षेत्रों में कम उम्र में विवाह सामान्य माना जाता था, वहीं अब परिवार बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने और आत्मनिर्भर बनाने पर अधिक जोर दे रहे हैं।
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर भी पड़ा असर
रिपोर्ट दर्शाती है कि हिमाचल में सामाजिक जागरूकता का स्तर लगातार बढ़ा है। विवाह की बढ़ती आयु का सीधा असर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। हिमाचल में बेटियों की बदलती सोच का असर जनसंख्या संरचना पर भी दिखाई दे रहा है। प्रदेश की कुल प्रजनन दर 1.5 तक पहुंच चुकी है, जो राष्ट्रीय औसत 1.9 से कम है।