हम प्रभु की प्राप्ति करें: निरंकारी बाबा जी - Arth Parkash
Wednesday, November 21, 2018
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हम प्रभु की प्राप्ति करें: निरंकारी बाबा जी

हम प्रभु की प्राप्ति करें: निरंकारी बाबा जी

पीरो-पैगम्बरों की, अल्लाह और राम की जय बुलाई जा रही है तो अगर इनकी जय बुलायें तो साथ ही मन तो एकदम से दया से भर जाना चाहिए, मन में तो करुणा भर जानी चाहिए लेकिन इनका नाम लेकर दूसरों को मारने-काटने पर उतारु हो जाते हैं, दूसरों को मिटाने में इस तरह के नारे लगाकर उस दिशा में बढऩे लग पड़ते हैं। वही बात फिर से आ जायेगी कि दरअसल न अल्लाह के साथ जुड़े हुए हैं, न राम की पहचान है। केवल नारे हैं, केवल शब्द हैं और फिर ये मज़हब और धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी करते हैं, चारों तरफ का वातावरण भय वाला बना देते हैं, पीड़ाजनक बना देते हें, जिसके कारण मातम फैल जाते हैं, शहरों में कफ्र्यू लग जाते हैं, ऐसी स्थितियां बन जाती है।

दास वो पंक्ति अक्सर हजरत ईसा मसीह जी की दोहराता है कि Know God ye worship अर्थात जिसकी पूजा कर रहे हो उस प्रभु को जानो जिस परमात्मा की तुम सोचते हो अर्चना-पूजा कर रहे हो, इसको जाने बगैर कर रहे हो। जो कुछ क्रियाएं तुम कर रहे हो, वो तो प्रमाणित कर रही हैं कि तुम पूजा कर रहे हो लेकिन बिना जाने। इसको जाना नहीं, इसको सही मायनों में प्राप्त नहीं किया है। वो ही बात ब्रह्म की प्राप्ति, भ्रम की समाप्ति।

यह बोध हासिल हो जाता है तो फिर एक ही धर्म बाकी रह जाता है और वो है इन्सानियत वाला धर्म। हर पैगम्बर ने इन्सानियत वाला धर्म ही स्थापित किया था, उसी का ही प्रचार किया था। अगर प्यार, नम्रता, सहनशीलता की बातें ही थीं, तो वो इननियत वाली ही थी, वो कोई और नहीं थीं। इसलिए जब हम एक सच्चाइ्र में स्थित हो गए, जब वो मजहब-ओ-मिल्लत की दीवार गिर ई, फिर वाकई ही वो अवस्था बन जाती है, फिर ये जान जाते हैं कि एक नूर से ही सारे जगत की उत्पत्ति हुई है, चाहे वो पंजाबी है, सिन्धी है, गुजराती है, पगड़ी वाला है, टोपी वाला है, कोइ्र भी है, सब एक ही हैं। सारे हीपांच तत्व के बने हुए पुतले हैं। न जाति के हिसाब से फर्क किया जा सकता है, नधर्म के लिहाज से किया जा सकता है, न संस्कृतियों के लिहाज से, न प्रान्तों-मुल्कों के लिहाज से किया जा सकता है ओर न पहरावों के लिहाज से फर्क किया जा सकता है। कहीं पर भी इसमें वो भेद नहीं हो सकता है और अगर भेद वाल भाव बने हुए हं, क्योंकि सच से, हकीकत से अन्जान हैं, अन्धेरा ढो रहे हैं, अज्ञानता में विचरण कर रहे हैं, इसी के कारण तो हमारे भाव भेद वाले बने हुए हैं और इसीलिए ये चारों तरफ का वातावरण सुखद वातावरण नहीं बन पाता है जिसके कारण हम बेचैन होते हैं, पीड़ा महसूस करते हैं।

तात्पर्य, चाहत तो सुकून की है, चैन की है, शान्ति की है लेकिन अगर वो बीज ही न बोया जाये, तो हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि हमें मीठे फल प्राप्त हो जायेंगे? अगर वो पहला कदम उठाया ही नहीं गया है तो फिर कैसे फल तुम्हें प्राप्त होंगे, वो बीज तो डाला ही नहीं हैं तो इस तरह से मूलत: ये पहला पड़ाव आता है, हमें कदम उठाना होता है कि हम प्रभु की प्राप्ति करें, तभी हमारे बाकी के सिलसिले संवरते चले जायेंगे। फिर हमारी आत्मा का भी कल्याण हो जायेयगा, इसको भी मुक्ति मिल जायेगी, ये भी आवागमन के बन्धन से निजात पा जायेगी। इसी तरह से जब हम जीवन के सफर को तय करते हं, इस लोक की यात्रा को तय करते हैं, एक उजाले के तहत करते हैं, अनुभूति करके करते हैं तो फिर ये लोक की यात्रा भी संवर जाती है और आत्मा की भी बात बन जाती है हम लोक और परलोक, दोनों जहानों की बाजी जीतने वाले बन जाते हैं ।

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